अमेरिका-ईरान बातचीत के बीच रोड़ा बना ‘हॉर्मुज टोल विवाद’

अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में ‘हॉर्मुज टोल विवाद’ इस समय सबसे बड़ी रुकावट बनकर सामने आ रहा है। दोनों देशों के बीच यूरेनियम संवर्धन (uranium enrichment), पाबंदियों (sanctions) से राहत और खाड़ी में समुद्री सुरक्षा को लेकर पहले से ही काफी मतभेद थे, और अब इस नए विवाद ने खाई को और गहरा कर दिया है।

इस तनाव को देखते हुए तेहरान (ईरान की राजधानी) में राजनयिक हलचल काफी बढ़ गई है। आस-पड़ोस के देश हरसंभव कोशिश कर रहे हैं कि यह विवाद ग्लोबल शिपिंग रूट्स (समुद्री व्यापारिक रास्तों) और दुनिया के एनर्जी मार्केट को नुकसान न पहुंचाए।

इसी सिलसिले में इस हफ्ते ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराक्ची ने तेहरान में पाकिस्तान के आंतरिक मामलों के मंत्री (इंटीरियर मिनिस्टर) मोहसिन नकवी से मुलाकात की। दरअसल, पाकिस्तान पर्दे के पीछे से तेहरान और वाशिंगटन (अमेरिका) के बीच बातचीत कराने की शांत कोशिशों में जुटा है। पाकिस्तानी अधिकारियों का कहना है कि इस बातचीत का मकसद तनाव को कम करना और मामले को सुलझाने का कोई रास्ता निकालना है।

यह मुलाकात बेहद नाजुक मोड़ पर हुई है। पिछले कुछ हफ्तों में वाशिंगटन का रुख काफी कड़ा हुआ है, खासकर ईरान के बढ़ते यूरेनियम स्टॉक और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) में समुद्री रास्तों पर कंट्रोल बढ़ाने की ईरान की कोशिशों को लेकर।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने साफ संकेत दिए हैं कि वाशिंगटन, ईरान के परमाणु मुद्दे और खाड़ी में जहाजों की बेरोकटोक आवाजाही (freedom of navigation) को एक ही चश्मे से देख रहा है।

बदला हुआ माहौल: सालों तक ईरान के साथ होने वाली बातचीत सिर्फ सेंट्रीफ्यूज, परमाणु जांच और पाबंदियों को हटाने के इर्द-गिर्द घूमती थी। लेकिन इस बार दायरा काफी बड़ा हो गया है। अब समुद्री रास्तों पर पहुंच, ऊर्जा परिवहन (energy transit) और क्षेत्र में अपना दबदबा बनाए रखना बातचीत के केंद्र में आ गया है।

इस पूरे मामले में पाकिस्तान का रोल क्यों है अहम?

पाकिस्तान की इस कोशिश पर लोगों का ध्यान इसलिए जा रहा है क्योंकि आज के समय में बहुत कम ऐसे देश बचे हैं, जिनके संबंध इस विवाद से जुड़े सभी पक्षों के साथ ठीक-ठाक हों।

  • ईरान: पड़ोसी होने के नाते सीधे संबंध हैं।
  • अमेरिका: वाशिंगटन के साथ पाकिस्तान के पुराने सुरक्षा रिश्ते हैं।
  • खाड़ी देश: गल्फ देशों के साथ गहरे आर्थिक संबंध हैं।
  • चीन: रणनीतिक रूप से पाकिस्तान और चीन बेहद करीब हैं।

इसी वजह से पाकिस्तान ऐसे मोड़ पर चुपचाप बातचीत का जरिया बन पा रहा है, जहां दूसरे देश नहीं पहुंच सकते।

हालांकि, पाकिस्तान इस बात का पूरा ख्याल रख रहा है कि वह सामने से आकर ‘बिचौलिया’ न दिखे। सार्वजनिक रूप से उनकी भाषा बहुत संभली हुई है। उनका पूरा जोर दोनों पक्षों के बीच की “दूरी को पाटने” और क्षेत्र में शांति बनाए रखने पर है, न कि खुद बातचीत की कमान संभालने पर। पर्दे के पीछे पाकिस्तान का सीधा सा मकसद है: खाड़ी में कोई नया संकट खड़ा न हो, जिससे दुनिया को बड़ा आर्थिक झटका लगे।

आखिर ‘हॉर्मुज टोल विवाद’ इतना जरूरी क्यों है?

‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ दुनिया के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक है। दुनिया भर में व्यापार होने वाले कच्चे तेल का करीब पांचवां (1/5) हिस्सा इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है, जो ईरान को अरब प्रायद्वीप (Arabian Peninsula) से अलग करता है।

एशियाई देशों, खासकर भारत के लिए इसके मायने बहुत बड़े हैं, समझिए भारत में तेल संकट कितना बड़ा मुद्दा है:

  • इस रास्ते में जरा सी भी रुकावट आई, तो जहाजों का किराया (freight costs) और इंश्योरेंस रेट्स तुरंत बढ़ जाते हैं।
  • इसका सीधा असर रिफाइनरियों और आखिर में आम जनता के लिए पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ता है।
  • बाजार को किसी बड़ी नाकेबंदी का इंतजार नहीं करना पड़ता; सिर्फ अशांति की आशंका ही तेल के दाम बढ़ाने के लिए काफी होती है।

यही वजह है कि हॉर्मुज टोल विवाद ने वाशिंगटन और खाड़ी देशों की चिंता बढ़ा दी है। ईरान के राजनीतिक गलियारों का मानना है कि उसके तट के पास से गुजरने वाले जहाजों पर ईरान का आर्थिक नियंत्रण होना चाहिए। वहीं, अमेरिकी अधिकारी इसे अलग तरह से देखते हैं। उन्हें सिर्फ टोल टैक्स से दिक्कत नहीं है, बल्कि उन्हें डर है कि अगर आज ईरान को इसकी छूट मिल गई, तो ग्लोबल ट्रेड (वैश्विक व्यापार) के लिए बेहद जरूरी इस रास्ते पर एक गलत मिसाल कायम हो जाएगी।

यूरेनियम का मुद्दा अब भी बड़ी दीवार

इस नए विवाद के बीच पुराना यूरेनियम विवाद भी अपनी जगह बना हुआ है। वाशिंगटन का अब भी यही कहना है कि ईरान के पास भारी मात्रा में यूरेनियम संवर्धित करने की क्षमता नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इससे परमाणु हथियार बनाने का रास्ता आसान हो सकता है। दूसरी तरफ, ईरान का तर्क है कि उसके परमाणु ढांचे को लेकर बाहरी देशों की शर्तें उसकी संप्रभुता (sovereignty) और सुरक्षा के खिलाफ हैं।

फिलहाल कोई भी पक्ष झुकने को तैयार नहीं दिख रहा है:

  • ईरान के नेता सालों से अपने परमाणु कार्यक्रम को देश की आजादी और स्वाभिमान से जोड़कर देखते आए हैं।
  • अमेरिका में घरेलू राजनीति के चलते ईरान को कोई भी ढील देना सरकार के लिए आसान नहीं है, खासकर तब जब कच्चे तेल की कीमतें और क्षेत्रीय तनाव पहले से ही वैश्विक अर्थव्यवस्था को परेशान कर रहे हैं।

तेल बाजार की टिकी हैं नजरें

पिछले कुछ हफ्तों से तेल बाजार खाड़ी की हर हलचल पर पैनी नजर रखे हुए है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अब डर सिर्फ इस बात का नहीं है कि रास्ता पूरी तरह बंद हो जाएगा, बल्कि बड़ी चिंता यह है कि यह अनिश्चितता तेल की कीमतों को स्थायी रूप से बढ़ा न दे।

अगर जहाजों का बीमा महंगा होता है, रूट बदलकर लंबे रास्तों से जाना पड़ता है, या मिलिट्री का जोखिम बढ़ता है, तो रास्ता बंद न होने पर भी तेल के दाम धीरे-धीरे ऊपर चले जाएंगे।

भारत के लिए हॉर्मुज टोल विवाद कितनी बड़ी चिंता: भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में कच्चा तेल आयात (import) करता है। अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं, तो भारत के लिए महंगाई को संभालना और आयात का खर्च उठाना बेहद मुश्किल हो जाएगा—वह भी ऐसे समय में जब दुनिया भर में आर्थिक विकास की रफ्तार पहले से ही धीमी है।

क्या हॉर्मुज पर टोल टैक्स वसूलेगा ईरान ?

‘हॉर्मुज टोल विवाद’ अब परमाणु मुद्दे की तरह ही अमेरिका और ईरान के बीच तनाव की सबसे बड़ी वजह बन चुका है। ईरान इस भौगोलिक रास्ते और ऊर्जा संकट को अपने फायदे (leverage) के रूप में देख रहा है। वहीं, अमेरिका और उसके साथी देश किसी भी कीमत पर यह नहीं चाहते कि कोई एक देश ग्लोबल ट्रेड के इतने बड़े रास्ते को अपने काबू में करे।

यह तनाव इतनी जल्दी खत्म होने वाला नहीं है, भले ही आने वाले दिनों में कोई अस्थायी समझौता क्यों न हो जाए। फिलहाल, बैकचैनल डिप्लोमेसी (पर्दे के पीछे की बातचीत) जारी है, भले ही नेताओं के बयानों में तल्खी दिख रही हो। लेकिन एक बात साफ है- हॉर्मुज टोल विवाद अब कोई छोटा-मोटा मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यही अब इस पूरी बातचीत की दिशा तय कर रहा है।

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