भारत ने अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद ही एक कड़ा और ऐतिहासिक फैसला लेते हुए ‘सिंधु जल समझौता’ (Indus Waters Treaty) को ठंडे बस्ते में डाल दिया था। तब से लेकर अब तक, नदियों के पानी पर जिंदा रहने वाले पाकिस्तान का हलक पूरी तरह सूखने लगा है। पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसते और हांफते पाकिस्तान की हालत अब यह हो गई है कि उसके नेता अपनी बौखलाहट छिपाने के लिए खोखली धमकियां देने पर उतर आए हैं।
पाकिस्तान को अब अपना वजूद खतरे में नजर आ रहा है। यही वजह है कि हाल के दिनों में पाकिस्तानी नेताओं की बयानबाज़ी अचानक तेज हो गई है। पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ज़रदारी अब “सम्मान के साथ शांति” की दुहाई दे रहे हैं। उप-प्रधानमंत्री इशाक डार इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का हवाला देकर अपना हक बता रहे हैं, जबकि जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक भारत को ‘गंभीर नतीजों’ की चेतावनियां दे रहे हैं। कैमरे पर दिखने वाले इस गुस्से के पीछे कोई कूटनीतिक ताकत नहीं है, बल्कि यह उस गहरे खौफ का नतीजा है कि अगर भारत ने सख्ती कम नहीं की, तो पाकिस्तान के खेत और अर्थव्यवस्था दोनों बंजर हो जाएंगे।
इस बौखलाहट का कारण यह भी है कि पिछले 60 सालों में जो समझौता 1965, 1971 और 1999 (कारगिल) की जंगों की तोपों के बीच भी नहीं टूटा था, उसे भारत ने आतंकवाद के मुद्दे पर रोककर पाकिस्तान की सबसे कमजोर नस दबा दी है। और इसका असर अब साफ नजर आ रहा है।
पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल पी.आर. शंकर (सेवानिवृत्त) ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि यदि अमेरिका JCPOA से बाहर निकल सकता है, रूस INF Treaty से हट सकता है और चीन दक्षिण चीन सागर मामले में हेग ट्रिब्यूनल के फैसले को खारिज कर सकता है, तो भारत भी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों को ध्यान में रखते हुए सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty – IWT) को अस्थायी रूप से निलंबित कर सकता है।
दरअसल ‘सिंधु जल समझौता’ पर पाकिस्तान कहता रहा है कि, 1960 की सिंधु जल संधि (IWT) में भारत को इसे एकतरफा निलंबित या खत्म करने का स्पष्ट अधिकार नहीं दिया गया है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों का कहना है कि वियना कन्वेंशन (VCLT) के तहत अगर संधि का गंभीर उल्लंघन हुआ हो या परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आया हो, तो कुछ विशेष हालात में सिंधु जल समझौता को निलंबित करने का कानूनी आधार बन सकता है।
परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (PCA) का कहना है कि भारत द्वारा संधि को निलंबित करने की घोषणा से चल रही मध्यस्थता की प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ता। वहीं, भारत इस दावे को नहीं मानता और PCA के अधिकार-क्षेत्र पर ही सवाल उठाता है।
सिंधु जल समझौता (Indus Waters Treaty) क्या है ?
सिंधु जल समझौता (Indus Waters Treaty – IWT) भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुआ एक जल-बंटवारा समझौता है। इसे वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता में तैयार किया गया था और उस समय भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तथा पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब ख़ान ने इस पर हस्ताक्षर किए थे।

सिंधु जल समझौते के तहत पूर्वी नदियां—रावी, ब्यास और सतलुज—का पानी मुख्य रूप से भारत को मिला, जबकि पश्चिमी नदियां—सिंधु, झेलम और चिनाब—का अधिकांश पानी पाकिस्तान के हिस्से में गया। हालांकि, भारत को पश्चिमी नदियों पर घरेलू उपयोग, सिंचाई और जलविद्युत परियोजनाओं जैसे सीमित अधिकार भी दिए गए हैं।
करीब छह दशक से अधिक समय तक यह समझौता दोनों देशों के बीच जल बंटवारे का आधार बना रहा, हालांकि समय-समय पर इसकी व्याख्या और विभिन्न परियोजनाओं को लेकर विवाद भी होते रहे हैं।
राष्ट्रीय हित सर्वोपरि: जब बड़े देशों ने तोड़े अंतरराष्ट्रीय समझौते
दुनिया के अन्य ताकतवर देशों—खासकर अमेरिका, रूस और चीन—ने भी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों को बचाने के लिए पहले कई बड़े अंतरराष्ट्रीय समझौतों और फैसलों को ठुकराया या तोड़ा है। इसके कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं:
- ईरान परमाणु समझौता (JCPOA): साल 2018 में अमेरिका 2015 में हुए इस समझौते से एकतरफा बाहर हो गया था। अमेरिकी प्रशासन का तर्क था कि इस समझौते में बुनियादी कमियां हैं। यह समझौता ईरान के मिसाइल प्रोग्राम और इलाके में उसकी दखलअंदाजी को नहीं रोकता। साथ ही, इसमें कुछ ऐसी शर्तें (sunset clauses) थीं, जिनके खत्म होने पर भविष्य में ईरान फिर से अपना परमाणु कार्यक्रम शुरू कर सकता था।
- आईएनएफ ट्रीटी (INF Treaty): शीत युद्ध (Cold War) के दौर का यह ऐतिहासिक हथियार नियंत्रण समझौता 2019 में तब खत्म हो गया, जब अमेरिका और उसके बाद रूस ने इससे अपने हाथ खींच लिए। अमेरिका ने रूस पर समझौते के नियम तोड़ने का आरोप लगाया। वहीं, रूस का कहना था कि अमेरिका और पश्चिमी देशों की गतिविधियों (जैसे यूरोप में मिसाइल डिफेंस सिस्टम लगाना) और दुनिया के बदलते सुरक्षा माहौल के कारण यह समझौता अब पुराना पड़ चुका है।
- संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून (UNCLOS) का फैसला: चीन ने इस समझौते को छोड़ा तो नहीं, लेकिन 2016 में अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल के उस फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया, जो दक्षिण चीन सागर में उसके द्वारा बनाए जा रहे कृत्रिम (बनावटी) द्वीपों के खिलाफ था। चीन ने तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल को उसकी संप्रभुता (क्षेत्रीय अधिकारों) के मामलों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है और उसने इस फैसले को गैरकानूनी व राजनीति से प्रेरित बताया।
भारतीय रक्षा विशेषज्ञ (Defence Experts) इतिहास के इन उदाहरणों का हवाला देते हुए कहते हैं कि दुनिया के बड़े देशों ने हमेशा किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते के नियमों का सख्ती से पालन करने के बजाय अपनी रणनीतिक सुरक्षा और जरूरतों को सबसे ऊपर रखा है।
भारत का स्पष्ट रुख: “खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते”
भारत का मूल रुख यह है कि सहयोग और सीमा पार से होने वाला आतंकवाद, दोनों एक साथ नहीं चल सकते। इसी बात को स्पष्ट करते हुए भारत ने एक मशहूर बयान दिया था कि “खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते”।
सिंधु जल समझौता (IWT) को लेकर भारत का आधिकारिक नजरिया और उठाए गए कदम मुख्य रूप से इन अहम बातों पर आधारित हैं:
- राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा निलंबन (रोक): 22 अप्रैल 2025 को हुए पहलगाम आतंकी हमले (जिसमें 26 लोगों की जान गई थी) के ठीक अगले दिन भारत ने इस समझौते को निलंबित कर दिया (यानी इस पर रोक लगा दी)। भारत का कड़ा रुख है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ कोई ठोस और प्रमाणित कार्रवाई नहीं करता, तब तक यह समझौता दोबारा बहाल नहीं होगा।
- पूरी तरह से द्विपक्षीय मामला: भारत का मानना है कि पानी का यह विवाद पूरी तरह से दोनों देशों के बीच (द्विपक्षीय) का मामला है, जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है। पाकिस्तान इस मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाकर दुनिया का ध्यान खींचने की कोशिश कर रहा है, जिसे भारत ने पूरी तरह खारिज कर दिया है।
- प्रक्रियाओं पर रोक, नदियों के बहाव पर नहीं: भारत ने साफ किया है कि फिलहाल बड़ी नदियों का पानी मोड़ने के लिए उसके पास जरूरी बुनियादी ढांचा (Infrastructure) नहीं है, इसलिए नदियों का असल बहाव नहीं रोका गया है। इसके बजाय, भारत ने समझौते के तहत होने वाले सभी आधिकारिक सहयोग और कागजी प्रक्रियाओं पर रोक लगा दी है। इसमें शामिल हैं:
- द हेग स्थित ‘स्थायी मध्यस्थता न्यायालय’ (PCA) जैसे विवाद सुलझाने वाले अंतरराष्ट्रीय मंचों का बहिष्कार करना और उसके फैसलों को कानूनी रूप से अमान्य (invalid) घोषित करना।
- पाकिस्तान के साथ पानी के बहाव और नदियों से जुड़ा तकनीकी डेटा साझा करने से इनकार करना।
- स्थायी सिंधु आयोग (Permanent Indus Commission) की बैठकों का बहिष्कार करना।
- पुरानी पड़ चुकी जल-स्थितियां: कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास यह तर्क देने का मजबूत आधार है कि 1960 के बाद से सिंधु बेसिन के पर्यावरण और इकोलॉजी (ecology) में भारी बदलाव आ चुका है। भारत का तर्क है कि यह समझौता 66 साल पहले बनाया गया था, और तब पिघलते ग्लेशियर, मानसून की अनिश्चितता और बेतहाशा बढ़ती आबादी जैसी आज की समस्याओं का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था।
सिंधु जल समझौता बहाल करने के लिए क्यों बेचैन है पाकिस्तान ?
1. भयानक जल संकट की ओर बढ़ता पाकिस्तान (Absolute Water Scarcity)
- सच्चाई: पाकिस्तान बहुत तेज़ी से ऐसे देशों की सूची में शामिल हो रहा है, जहां पानी पूरी तरह खत्म होने की कगार पर है।
- आंकड़े: साल 1951 में पाकिस्तान में हर व्यक्ति के लिए लगभग 5,000 क्यूबिक मीटर पानी उपलब्ध था। आज यह आंकड़ा भयानक रूप से गिरकर 1,000 क्यूबिक मीटर से भी नीचे आ चुका है।
2. पंजाब में तेजी से सूखता भूजल (Groundwater Depletion)
- सच्चाई: पंजाब के औद्योगिक (Industrial) और मध्य इलाकों में ज़मीन के नीचे का पानी उस गति से निकाला जा रहा है, जिसकी भरपाई कुदरत नहीं कर सकती।
- आंकड़े: लाहौर, फैसलाबाद और गुजरांवाला जैसे शहरों में कपड़ा, लेदर और बेवरेज (कोल्ड ड्रिंक आदि) की फैक्ट्रियां अंधाधुंध पानी खींच रही हैं। लाहौर के जल और स्वच्छता प्राधिकरण (WASA) की आधिकारिक रिपोर्ट मानती है कि शहर के कई इलाकों में ज़मीन का पानी हर साल 2 से 3 फीट नीचे जा रहा है।
3. शहरों में पानी के लिए हाहाकार और ‘टैंकर माफिया’ का राज
- सच्चाई: पंजाब के बड़े शहरों में पानी की भारी किल्लत ने एक नए प्राइवेट ‘टैंकर माफिया’ को जन्म दे दिया है।
- आंकड़े: उदाहरण के लिए, रावलपिंडी कैंट (Cantonment) इलाके में बड़े ट्यूबवेल फेल हो चुके हैं। हालात इतने खराब हैं कि वहां हर दूसरे दिन सिर्फ 30 मिनट के लिए सरकारी पानी आता है। इसका फायदा उठाकर प्राइवेट टैंकर माफिया ने पूरे इलाके पर कब्ज़ा कर लिया है। वे पानी के इतने मनमाने दाम वसूल रहे हैं, जो आम और गरीब परिवारों की पहुंच से बिल्कुल बाहर हैं।
4. प्रांतों की आपसी जंग: पंजाब पर पानी चुराने का आरोप
- सच्चाई: पानी की कमी के कारण पाकिस्तान के अपने ही राज्यों (प्रांतों) के बीच गृहयुद्ध जैसी नौबत आ गई है।
- आंकड़े: सिंधु नदी प्रणाली प्राधिकरण (IRSA) ने 2026 के खरीफ (गर्मी की फसल) सीज़न के लिए 15% पानी की कमी की घोषणा की थी। लेकिन इसका असर अलग-अलग प्रांतों पर अलग दिखा। जहां सिंध को 22% और बलूचिस्तान को अपने हिस्से का 71% कम पानी मिला, वहीं इन दोनों छोटे प्रांतों ने भारी विरोध जताते हुए आरोप लगाया है कि यह संकट इसलिए गहराया क्योंकि ‘पंजाब’ अपने हिस्से से ज्यादा पानी खींच रहा है।
अगर भारत सिंधु नदी प्रणाली (विशेषकर पश्चिमी नदियों—सिंधु, झेलम और चिनाब) का पानी पूरी तरह रोक दे या बड़े पैमाने पर मोड़ दे, तो पाकिस्तान पर इसका असर केवल एक संकट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह उसके अस्तित्व के लिए एक ‘भू-राजनीतिक और आर्थिक भूचाल’ साबित होगा।
1. कृषि और खाद्य सुरक्षा का पतन (Agriculture & Food Security)
- अर्थव्यवस्था की रीढ़ टूटना: पाकिस्तान की लगभग 20-25% जीडीपी (GDP) और आधी आबादी सीधे तौर पर कृषि पर निर्भर है। पाकिस्तान की खेती का लगभग 80% हिस्सा पूरी तरह से सिंधु नदी के सिंचाई नेटवर्क (दुनिया के सबसे बड़े नहरी सिस्टम) पर टिका है।
- अकाल जैसी स्थिति: पंजाब और सिंध प्रांत, जो पाकिस्तान के ‘फूड बास्केट’ (अन्न भंडार) हैं, बंजर होने लगेंगे। गेहूं, चावल और गन्ने जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार गिर जाएगी, जिससे देश में भयंकर खाद्य संकट (Food Crisis) पैदा हो जाएगा।
2. अर्थव्यवस्था और निर्यात पर सीधा प्रहार (Economic Impact)
- टेक्सटाइल इंडस्ट्री की तबाही: पाकिस्तान के कुल निर्यात (Exports) का लगभग 60% हिस्सा टेक्सटाइल (कपड़ा उद्योग) से आता है, जो कपास (Cotton) की खेती पर निर्भर है। पानी रुकने से कपास की खेती बर्बाद हो जाएगी, जिससे फैक्टरियां बंद होंगी और लाखों लोग बेरोजगार हो जाएंगे।
- विदेशी मुद्रा का संकट: निर्यात रुकने और खाने-पीने का सामान आयात (Import) करने की मजबूरी के कारण पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार पूरी तरह खाली हो जाएगा, जिससे देश में हाइपरइन्फ्लेशन (बेकाबू महंगाई) आ जाएगी।
3. भयंकर ऊर्जा संकट (Energy / Hydropower Collapse)
- पाकिस्तान की कुल बिजली का लगभग 30% हिस्सा पनबिजली (Hydropower) से आता है, जो मुख्य रूप से सिंधु और झेलम नदियों पर बने डैम (जैसे तारबेला और मंगला डैम) से पैदा होता है।
- पानी रुकने या कम होने से ये डैम काम करना बंद कर देंगे। इससे देश भर में बड़े पैमाने पर ‘लोड शेडिंग’ (ब्लैकआउट) होगा, जिससे बचे-खुचे उद्योग और कारखाने भी ठप पड़ जाएंगे।
4. आंतरिक गृहयुद्ध और जल-दंगे (Social Unrest & Internal Conflict)
- प्रांतों के बीच टकराव: पाकिस्तान में पानी को लेकर पंजाब और सिंध प्रांत के बीच पहले से ही भारी अविश्वास और तनाव है। सिंध हमेशा आरोप लगाता है कि पंजाब उसका पानी चुराता है। पानी कम होने पर यह राजनीतिक विवाद एक हिंसक रूप ले सकता है।
- जनता का विद्रोह: शहरों और गांवों में पीने के पानी की किल्लत होने से सड़कों पर ‘जल-दंगे’ (Water Riots) भड़क सकते हैं, जिन्हें संभालना पुलिस या सेना के लिए लगभग असंभव हो जाएगा। यह आंतरिक अशांति पाकिस्तान को एक ‘विफल राष्ट्र’ (Failed State) की स्थिति में धकेल सकती है।
जाहिर है सिंधु का पानी रुकना पाकिस्तान के लिए एक निश्चित बर्बादी का परिदृश्य है। यही कारण है कि भारत द्वारा सिंधु जल समझौता को सिर्फ ‘निलंबित’ (Suspend) किए जाने मात्र से ही इस्लामाबाद में इतनी भारी घबराहट और बौखलाहट देखने को मिल रही है।
