मुख्य बात: ईरान के परमाणु बम बनाने की कहानी में पाकिस्तान का नाम दो बार आता है। पहले, ए.क्यू. खान नेटवर्क के जरिए पाकिस्तान ने ईरान को तकनीक जुटाने में मदद की। और आज, वही पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच समझौता कराने की कोशिश कर रहा है, ताकि ईरान के परमाणु खजाने पर काबू पाया जा सके।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम और पाकिस्तान का रिश्ता दो हिस्सों में बंटा है। पहला हिस्सा इतिहास का है, जब ईरान चुपचाप परमाणु तकनीक हासिल कर रहा था। दूसरा हिस्सा आज का है, जहाँ पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच ‘बीच-बचाव’ कर रहा है। यह एक अजीब इत्तेफाक है कि जिस देश ने शुरुआत में तकनीक पहुँचाने में मदद की, वही आज इस खतरे को कम करने के लिए बातचीत की मेज पर बैठा है।
सीधी बात यह है कि ईरान को परमाणु रास्ते पर आगे बढ़ाने में पाकिस्तान के ए.क्यू. खान (A.Q. Khan) नेटवर्क का बड़ा हाथ रहा है। इसी नेटवर्क ने ईरान को वह शुरुआती तकनीक दी, जिससे यूरेनियम को साफ़ (enrich) किया जाता है। हालांकि बाद में ईरान ने खुद अपना कार्यक्रम बढ़ाया, लेकिन इसकी नींव में पाकिस्तान की छाया साफ दिखती है।
परमाणु रास्ते पर पाकिस्तान की पुरानी मदद
साल 1987 में ईरान का संपर्क ए.क्यू. खान नेटवर्क से हुआ। यहीं से ईरान को वह मशीनें और तकनीक मिलीं, जो परमाणु बम बनाने के लिए जरूरी यूरेनियम तैयार करती हैं। किसी भी परमाणु कार्यक्रम में सबसे मुश्किल काम यूरेनियम को संवर्धित (enrich) करना होता है, और ईरान को इस काम में शुरुआती बढ़त पाकिस्तान से ही मिली थी।
भले ही यह पाकिस्तान सरकार का आधिकारिक फैसला नहीं था, लेकिन यह सच है कि पाकिस्तान से जुड़े इस नेटवर्क ने ईरान का रास्ता आसान कर दिया था।
मौजूदा जंग और शांति की कोशिशों को समझने के लिए यह पढ़ें: ट्रंप ने कहा ईरान युद्ध खत्म होने के करीब है.
ईरान का परमाणु कार्यक्रम अब कहाँ तक पहुँचा?
आज स्थिति काफी गंभीर हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के पास 440.9 किलोग्राम ऐसा यूरेनियम है जो 60% तक शुद्ध किया जा चुका है। परमाणु बम बनाने के लिए 90% शुद्धता चाहिए होती है। यानी ईरान मंजिल के बहुत करीब है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान चाहे, तो इस भंडार से करीब 10 परमाणु बम तैयार किए जा सकते हैं।
जरूरी बात
60% शुद्ध यूरेनियम सीधे बम में इस्तेमाल नहीं होता, लेकिन इसे 90% तक पहुँचाना बहुत आसान और कम समय का काम है। इसीलिए पूरी दुनिया डरी हुई है।
ईरान की अंदरूनी ताकत यानी IRGC को समझने के लिए यह लेख देखें: IRGC क्या है और 1979 की क्रांति ने ईरान को कैसे बदला.
अमेरिका आखिर क्या चाहता है?
अमेरिका की मांग साफ है: वह चाहता है कि ईरान अपना सारा संवर्धित यूरेनियम देश से बाहर भेज दे या उसे पूरी तरह नष्ट कर दे। अमेरिका को डर है कि अगर यह भंडार ईरान के पास रहा, तो वह कभी भी चुपके से परमाणु बम बना लेगा। इसी मुद्दे पर आज सारी बातचीत टिकी हुई है।
पाकिस्तान का नया रोल: अब सुलह कराने वाला
आज पाकिस्तान बदल गया है। वह अब ईरान को तकनीक नहीं दे रहा, बल्कि अमेरिका और ईरान के बीच मिडिएटर (मध्यस्थ) बनकर खड़ा है। पाकिस्तान चाहता है कि दोनों देशों के बीच जंग टल जाए। इसके पीछे पाकिस्तान का अपना फायदा भी है—वह नहीं चाहता कि उसके पड़ोस में कोई भीषण युद्ध हो।
ईरान की सैन्य ताकत के बारे में और जानने के लिए यहाँ पढ़ें: ईरान ने चीनी सैटेलाइट से अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया.
क्या सच है और क्या सिर्फ चर्चा?
- सच है: पाकिस्तान अमेरिका और ईरान की बातचीत करवा रहा है।
- सच है: अमेरिका चाहता है कि ईरान का यूरेनियम उसके कब्जे में आए।
- अभी पक्का नहीं: पाकिस्तान ने यूरेनियम सौंपने की कोई आखिरी डील पक्की कर ली है।
निष्कर्ष: एक बड़ी विडंबना
इस कहानी में सबसे बड़ी विडंबना यही है: कल जिस पाकिस्तान ने ईरान को परमाणु तकनीक का रास्ता दिखाया, आज वही पाकिस्तान उस रास्ते पर ‘ताला’ लगाने के लिए बातचीत की मेज पर बैठा है। पहले उसने तकनीक दी, और अब वह उसी तकनीक को काबू करने की कोशिशों में मदद कर रहा है।
निचोड़: ईरान की परमाणु कहानी में पाकिस्तान शुरू से लेकर आज तक मौजूद है। पहले एक मददगार के रूप में और अब एक सुलह कराने वाले मध्यस्थ के रूप में।
