Strategic Explainer
जब भी ईरान, इज़राइल, होरमुज़, प्रॉक्सी युद्ध, मिसाइल, ड्रोन या पश्चिम एशिया की किसी बड़ी तनातनी की बात होती है, एक नाम बार-बार सामने आता है। आईआरजीसी। पूरा नाम है इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स। लेकिन इसे सिर्फ ईरान की एक फौजी इकाई समझना बड़ी भूल होगी। आईआरजीसी दरअसल 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद बना वह शक्ति ढांचा है जिसका काम सिर्फ लड़ाई लड़ना नहीं बल्कि नई सत्ता व्यवस्था की रक्षा करना भी था।
यहीं से इस कहानी की असली शुरुआत होती है। अगर आप समझना चाहते हैं कि आईआरजीसी क्या है और यह इतना शक्तिशाली क्यों है तो पहले यह समझना जरूरी है कि 1979 की इस्लामिक क्रांति क्या थी, शाह के खिलाफ इतना गुस्सा क्यों जमा हुआ, आयतुल्लाह खोमैनी कैसे उभरे, और नई इस्लामिक रिपब्लिक को नियमित सेना के साथ एक अलग क्रांतिकारी गार्ड बल की जरूरत क्यों पड़ी।
अगर आप इस टकराव की बड़ी पृष्ठभूमि समझना चाहते हैं तो हमारी यह रिपोर्ट भी पढ़ सकते हैं: अमेरिका-ईरान दुश्मनी का पूरा इतिहास.
इस्लामिक क्रांति क्या थी
1978 और 1979 की ईरानी क्रांति ने शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी की राजशाही को गिरा दिया और उसकी जगह इस्लामिक रिपब्लिक की स्थापना हुई। यह सिर्फ सरकार बदलने की घटना नहीं थी। इसने ईरान की सत्ता का ढांचा, सेना की भूमिका, धर्म और राजनीति का रिश्ता, और दुनिया से उसके संबंध तक बदल दिए। ब्रिटानिका के अनुसार यह आंदोलन बहुत व्यापक था। इसमें धार्मिक नेतृत्व, छात्र, व्यापारी, शहरी तबके, वामपंथी और शाह-विरोधी दूसरे समूह भी शामिल थे।
यानी इसे सिर्फ धार्मिक विद्रोह कहना अधूरा होगा। यह राजशाही के खिलाफ विद्रोह भी था। यह दमनकारी सत्ता के खिलाफ गुस्सा भी था। और यह उस भावना का विस्फोट भी था जिसमें बहुत से ईरानी मानते थे कि उनका देश आधुनिक तो बन रहा है लेकिन अपनी पहचान खो रहा है।
शाह के खिलाफ इतना गुस्सा क्यों था
शाह के दौर में ईरान में उद्योग, आधुनिक ढांचा और राज्य की ताकत बढ़ी। लेकिन उसी दौर में राजनीतिक दमन भी बढ़ा। विरोधियों पर दबाव बढ़ा। बहुत से लोगों को लगा कि विकास ऊपर से थोपा जा रहा है। शाह पश्चिम, खासकर अमेरिका, के करीब माने जाते थे। इससे भी असंतोष बढ़ा। बहुतों को लगा कि देश की दिशा तेहरान से कम और वॉशिंगटन से ज्यादा तय हो रही है।
यहां एक बात बहुत लोग नहीं जानते। शाह के खिलाफ सिर्फ मौलवी नहीं थे। छात्र थे। व्यापारी थे। बुद्धिजीवी थे। राष्ट्रवादी थे। वामपंथी भी थे। यानी शाह-विरोध एक बड़ा मोर्चा था। लेकिन शाह के बाद ईरान कैसा दिखना चाहिए इस सवाल पर सब एकमत नहीं थे। यही बात आगे चलकर निर्णायक साबित हुई।
खोमैनी कौन थे और इतने बड़े कैसे बने
आयतुल्लाह रुहोल्लाह खोमैनी शाह-विरोधी आंदोलन का सबसे प्रभावशाली धार्मिक चेहरा बनकर उभरे। वे निर्वासन में थे लेकिन उनकी आवाज लगातार ईरान पहुंच रही थी। भाषण, संदेश और धार्मिक नेटवर्क ने उन्हें एक ऐसे नेता में बदल दिया जो सिर्फ सरकार बदलने की बात नहीं कर रहे थे बल्कि नई व्यवस्था का खाका भी दे रहे थे। ब्रिटानिका बताती है कि क्रांति के बाद वे ईरान की सर्वोच्च राजनीतिक और धार्मिक सत्ता बन गए।
1979 में आखिर हुआ क्या
1978 में विरोध तेज हुआ। 1979 की शुरुआत तक हालात इतने बिगड़ गए कि शाह जनवरी में देश छोड़कर चला गया। फरवरी 1979 में पुरानी व्यवस्था ढह गई। बाद में जनमत-संग्रह के जरिए इस्लामिक रिपब्लिक को औपचारिक रूप मिला। लेकिन असली सवाल यहीं शुरू हुआ। नई सत्ता पर नियंत्रण किसका होगा। कौन नई व्यवस्था के संस्थान बनाएगा। और किस पर भरोसा किया जाएगा।
तस्वीरों में देखें: सड़क के विरोध से लेकर क्रांतिकारी सत्ता ढांचे के उभार तक की यह यात्रा ईरान की कहानी को और साफ करती है।
ईरान की इस्लामिक क्रांति से आईआरजीसी तक
सड़क के विरोध से लेकर क्रांतिकारी शक्ति ढांचे तक की झलक






यही वह क्षण था जब खोमैनी खेमे ने पुराने सरकारी ढांचे के समानांतर नए क्रांतिकारी संस्थान बनाने शुरू किए। आईआरजीसी उसी सत्ता-निर्माण की कहानी की उपज थी।
आईआरजीसी की जरूरत क्यों पड़ी
नई इस्लामिक व्यवस्था पुरानी सेना पर पूरा भरोसा नहीं करती थी क्योंकि वह सेना मूल रूप से शाह के दौर की थी। इसी वजह से अप्रैल 1979 में एक आदेश के जरिए आईआरजीसी की स्थापना की गई। ब्रिटानिका के अनुसार इसका शुरुआती मकसद था क्रांति की रक्षा करना, नई व्यवस्था को सुरक्षित रखना, और उन ताकतों को संगठित करना जो शाह-विरोधी संघर्ष से निकली थीं।
सीधी भाषा में कहें तो नियमित सेना देश की पारंपरिक फौज थी। आईआरजीसी नई क्रांति की सुरक्षा ढाल थी। सेना सीमा की रक्षा करती है। आईआरजीसी सत्ता व्यवस्था, क्रांति और उसके रणनीतिक असर की रक्षा करता है। यही फर्क इसे अलग बनाता है।
नियमित सेना और आईआरजीसी में फर्क क्या है
ईरान की नियमित सेना है जिसे पारंपरिक सैन्य ढांचे के रूप में देखा जाता है। लेकिन आईआरजीसी अलग है। इसकी जवाबदेही अलग है। इसकी वैचारिक भूमिका अलग है। ब्रिटानिका के मुताबिक यह ईरान की नियमित सेना से स्वतंत्र है और सर्वोच्च नेता के दफ्तर के प्रति जवाबदेह मानी जाती है।
अगर बहुत आसान भाषा में कहें तो नियमित सेना राज्य की पारंपरिक सैन्य ताकत है। आईआरजीसी नई इस्लामिक व्यवस्था का सख्त सुरक्षा ढांचा है।
आईआरजीसी की सैन्य संरचना और ईरान की जमीनी रणनीति को समझने के लिए यह विश्लेषण भी उपयोगी है: ईरान में जमीनी हमला अमेरिका के लिए क्यों जाल बन सकता है.
आईआरजीसी इतना शक्तिशाली कैसे बना
शुरुआत में आईआरजीसी का जन्म क्रांति की रक्षा के लिए हुआ था। लेकिन ईरान-इराक युद्ध ने इसे बदल दिया। काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के अनुसार इसी युद्ध ने आईआरजीसी को सैन्य अनुभव, वैधता, नेटवर्क और प्रतिष्ठा दी। बाद के वर्षों में इसका असर राजनीति, व्यापार, निर्माण, आंतरिक सुरक्षा और विदेशों में रणनीतिक अभियानों तक फैल गया।
यही वजह है कि आज आईआरजीसी को सिर्फ बंदूकधारी बल नहीं माना जाता। यह राज्य के भीतर खड़ा एक अलग ताकतवर केंद्र बन चुका है। यह आखिरी बात उपलब्ध स्रोतों में वर्णित उसके बहु-स्तरीय असर से निकलता विश्लेषणात्मक निष्कर्ष है।
कुद्स फोर्स क्या है
अगर आईआरजीसी नई व्यवस्था की ढाल है तो कुद्स फोर्स उसकी बाहरी भुजा है। ब्रिटानिका के अनुसार कुद्स फोर्स आईआरजीसी का वह खास हिस्सा है जो विदेशों में अभियानों के लिए जिम्मेदार है। इसका काम उन स्थानीय ताकतों को संगठित करना, समर्थन देना और कभी-कभी उनका नेतृत्व करना है जिनसे ईरान और उसकी सत्ता व्यवस्था को रणनीतिक फायदा हो।
इसी वजह से इराक, सीरिया, लेबनान और व्यापक पश्चिम एशिया की बड़ी खबरों में कुद्स फोर्स और आईआरजीसी का नाम बार-बार आता है।
बसीज क्या है
आईआरजीसी को समझते समय एक और नाम आता है। बसीज। यह एक स्वयंसेवी मिलिशिया ढांचा है जिसे आंतरिक लामबंदी, सामाजिक नियंत्रण और विरोधी गतिविधियों पर नजर रखने वाली व्यवस्था के हिस्से के रूप में देखा जाता है। यानी आईआरजीसी की कहानी सिर्फ सीमा या युद्धक्षेत्र की नहीं, देश के भीतर की व्यवस्था और नियंत्रण की भी कहानी है।
दुनिया इसे लेकर इतनी सतर्क क्यों रहती है
क्योंकि आईआरजीसी की भूमिका पारंपरिक रक्षा से आगे जाती है। यह मिसाइल, ड्रोन, खाड़ी क्षेत्र में दबाव, क्षेत्रीय नेटवर्क और ईरान की रणनीतिक संकेत-नीति से जुड़ती है। यही वजह है कि पश्चिम एशिया की लगभग हर बड़ी तनातनी में इसका नाम उभरता है।
ईरान की बढ़ती तकनीकी और लक्ष्यभेदी क्षमता पर हमारी यह रिपोर्ट भी इस संदर्भ को और साफ करती है: चीन के जासूसी सैटेलाइट से ईरान की बढ़ती मारक क्षमता.
रॉयटर्स ने अप्रैल 2026 में रिपोर्ट किया कि अर्जेंटीना ने आईआरजीसी को आतंकवादी संगठन घोषित किया। इससे यह भी दिखता है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इसे लेकर सुरक्षा दृष्टि कितनी कठोर होती जा रही है।
जो बातें लोग अक्सर नहीं जानते
पहली बात। आईआरजीसी शुरुआत से पारंपरिक सेना नहीं थी। यह क्रांति की रक्षा के लिए बनाई गई थी। दूसरी बात। 1979 की क्रांति सिर्फ धार्मिक विद्रोह नहीं थी। इसमें अलग-अलग तबकों का गुस्सा शामिल था लेकिन आखिर में धार्मिक नेतृत्व ने संस्थानों पर मजबूत नियंत्रण बना लिया। तीसरी बात। शाह के जाने के बाद सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं था कि कौन जीता। असली सवाल था कि नई व्यवस्था के संस्थानों पर किसका नियंत्रण बनेगा। आईआरजीसी उसी सत्ता-निर्माण की कहानी का हिस्सा है। चौथी बात। आईआरजीसी की ताकत सिर्फ मिसाइल या बंदूक से नहीं आती। उसकी असली ताकत उसके नेटवर्क, राजनीतिक पहुंच, आर्थिक असर और वैचारिक वैधता के दावे से भी आती है।
बड़ी तस्वीर
अगर एक लाइन में समझना हो तो सबसे सही बात यह होगी। आईआरजीसी ईरान की सिर्फ सेना नहीं है। यह 1979 की इस्लामिक क्रांति से पैदा हुआ वह शक्ति ढांचा है जो सत्ता की रक्षा, फौजी जवाब, क्षेत्रीय रणनीति और घरेलू नियंत्रण चारों को एक साथ जोड़ता है।
और अगर इस्लामिक क्रांति को एक लाइन में समझना हो तो यह। 1979 की इस्लामिक क्रांति ने सिर्फ शाह को नहीं हटाया था। उसने ईरान की सत्ता, सेना, विचारधारा और दुनिया से उसके रिश्तों को नए सिरे से गढ़ दिया था।
स्रोत: ब्रिटानिका की ईरानी क्रांति रिपोर्ट, ब्रिटानिका की आईआरजीसी प्रोफाइल, ब्रिटानिका की कुद्स फोर्स प्रोफाइल, काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस की पृष्ठभूमि रिपोर्ट, रॉयटर्स की 2026 रिपोर्ट