‘ओरेशनिक’ मिसाइल, टूटती बातचीत और दुनिया के लिए बढ़ता खतरा
चार साल से चल रहा रूस-यूक्रेन युद्ध 2026 में फिर बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुँच गया है। रूस ने हाल के दिनों में यूक्रेन पर सैकड़ों ड्रोन और दर्जनों मिसाइलों से बड़ा हमला किया। इन हमलों में “ओरेशनिक” हाइपरसोनिक मिसाइल के इस्तेमाल की खबर ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। रूस इसे अपनी नई पीढ़ी का अत्याधुनिक हथियार बता रहा है, जबकि पश्चिमी देशों का कहना है कि यह युद्ध को और ज्यादा आक्रामक दिशा में ले जा सकता है।
दूसरी तरफ यूक्रेन दावा कर रहा है कि उसने कुछ इलाकों में रूसी सेना को पीछे धकेला है। लेकिन जमीन पर हालात अब भी बेहद तनावपूर्ण हैं। पूर्वी यूक्रेन में लड़ाई जारी है, शांति वार्ता लगभग ठप पड़ चुकी है और यूरोप को डर है कि यह संघर्ष आने वाले महीनों में और बड़ा रूप ले सकता है।
यह युद्ध अब सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं रह गया। इसका असर तेल बाजार, खाद्य आपूर्ति, हथियार उद्योग, यूरोपीय राजनीति और एशिया तक महसूस किया जा रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है
ओरेशनिक मिसाइल आखिर है क्या?
ओरेशनिक रूस की नई हाइपरसोनिक बैलिस्टिक मिसाइल मानी जा रही है। इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी गति है। रिपोर्टों के अनुसार यह आवाज की रफ्तार से कई गुना तेज उड़ सकती है और उड़ान के दौरान दिशा बदलने की क्षमता भी रखती है। यही वजह है कि इसे रोकना बेहद कठिन माना जा रहा है।
रूस का दावा है कि यह मिसाइल दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देकर सीधे अपने लक्ष्य तक पहुँच सकती है। हालिया हमलों में इसका इस्तेमाल कीव क्षेत्र के आसपास किया गया। यूक्रेन का कहना है कि रूस अब केवल सैन्य ठिकानों को नहीं, बल्कि शहरों के बुनियादी ढाँचे पर भी दबाव बना रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मिसाइल का इस्तेमाल केवल सैन्य रणनीति नहीं, बल्कि “मनोवैज्ञानिक दबाव” बनाने का तरीका भी है। जब राजधानी के पास ऐसी मिसाइल गिरती है, तो उसका असर आम लोगों और राजनीतिक नेतृत्व दोनों पर पड़ता है।

रूस ने अचानक इतने बड़े हमले क्यों बढ़ाए?
इसके पीछे कई वजहें दिखाई देती हैं।
पहली वजह — युद्ध में बढ़ती थकान
चार साल की लड़ाई के बाद रूस को अब तक वैसी निर्णायक जीत नहीं मिली जिसकी उम्मीद की जा रही थी। दूसरी तरफ यूक्रेन भी लगातार पश्चिमी सहायता पर निर्भर है। दोनों देशों की अर्थव्यवस्था और सैन्य क्षमता पर भारी दबाव बढ़ चुका है।
रूस अब तेज और बड़े हवाई हमलों के जरिए यूक्रेन की ऊर्जा व्यवस्था, हथियार कारखानों और एयर डिफेंस सिस्टम को कमजोर करना चाहता है। यही कारण है कि ड्रोन और मिसाइल हमलों की संख्या तेजी से बढ़ी है।
दूसरी वजह — यूक्रेन के ड्रोन हमले
हाल के महीनों में यूक्रेन ने रूस के अंदर तेल डिपो, रेलवे नेटवर्क और सैन्य ठिकानों पर ड्रोन हमले बढ़ा दिए हैं। रूस अब इसका जवाब बड़े पैमाने पर दे रहा है। कई रूसी क्षेत्रों में ऊर्जा ढाँचे को नुकसान पहुँचने की खबरें सामने आई हैं।
तीसरी वजह — बातचीत का टूटना
अमेरिका, यूरोप और अन्य देशों की कोशिशों के बावजूद शांति वार्ता आगे नहीं बढ़ पा रही। रूस अब भी डोनबास क्षेत्र पर अपना नियंत्रण चाहता है, जबकि यूक्रेन पीछे हटने को तैयार नहीं है। यही सबसे बड़ा गतिरोध बन चुका है।
रूस-बेलारूस परमाणु अभ्यास: क्या यूरोप के लिए बढ़ रहा है नया खतरा?
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पूरा विश्लेषण पढ़ें →क्या यूक्रेन कमजोर पड़ रहा है?
स्थिति पूरी तरह रूस के पक्ष में भी नहीं है।
यूक्रेन लगातार पश्चिमी हथियारों और खुफिया सहायता के सहारे लड़ाई जारी रखे हुए है। यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने दावा किया कि उनकी सेना ने 2026 में कुछ क्षेत्रों में रूस को पीछे धकेला है। पश्चिमी विश्लेषकों के अनुसार रूस की प्रगति पहले की तुलना में धीमी हुई है।
लेकिन यूक्रेन के सामने कई गंभीर समस्याएँ हैं:
- एयर डिफेंस मिसाइलों की कमी
- सैनिकों की थकान
- लगातार आर्थिक दबाव
- अमेरिका की घटती सहायता
- ऊर्जा संकट
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों के अनुसार 2025 और 2026 में नागरिक हताहतों की संख्या फिर बढ़ी है। लंबी दूरी की मिसाइलें और ड्रोन अब शहरों को ज्यादा निशाना बना रहे हैं।
यानी यूक्रेन अब भी लड़ रहा है, लेकिन उसकी कीमत लगातार बढ़ती जा रही है।
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यूरोप इतना चिंतित क्यों है?
यूरोप को डर है कि अगर युद्ध और लंबा चला तो इसका असर पूरे महाद्वीप की सुरक्षा पर पड़ेगा।
रूस पहले ही संकेत दे चुका है कि वह पीछे हटने के मूड में नहीं है। दूसरी तरफ यूरोपीय देश यूक्रेन को लगातार सैन्य सहायता दे रहे हैं। इससे तनाव और बढ़ रहा है।
फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन अब खुलकर यूक्रेन के समर्थन में दिखाई दे रहे हैं। कई यूरोपीय नेता मानते हैं कि अगर रूस को नहीं रोका गया तो भविष्य में पूर्वी यूरोप के दूसरे देशों पर भी खतरा बढ़ सकता है।
यही कारण है कि यूरोप अब केवल दर्शक नहीं, बल्कि इस युद्ध का सक्रिय रणनीतिक हिस्सा बन चुका है।
भारत के लिए यह युद्ध क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत के लिए यह केवल दूर का युद्ध नहीं रहा।
भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि 217 भारतीय नागरिक रूसी सेना में शामिल हुए थे, जिनमें से 49 की मौत हो चुकी है। कई लोगों को “लापता” बताया गया है।
यह मामला भारत के लिए बेहद संवेदनशील है, क्योंकि रूस भारत का पुराना रणनीतिक साझेदार रहा है। लेकिन अब सवाल उठ रहे हैं:
- भारतीय युवक रूस तक पहुँचे कैसे?
- भर्ती नेटवर्क किसने चलाया?
- क्या आर्थिक मजबूरी इसकी वजह बनी?
- भारत रूस पर कितना दबाव बना सकता है?
भारत सरकार इन लोगों की वापसी और एजेंटों के खिलाफ कार्रवाई की बात कर रही है। लेकिन यह घटना दिखाती है कि यह युद्ध अब भारत को भी सीधे प्रभावित करने लगा है।
क्या यह युद्ध और बड़ा हो सकता है?
सबसे बड़ा डर यही है।
अगर रूस लगातार हाइपरसोनिक मिसाइलों का इस्तेमाल बढ़ाता है और पश्चिमी देश यूक्रेन को और भारी हथियार देते हैं, तो तनाव और बढ़ सकता है। काला सागर, बाल्टिक क्षेत्र और पूर्वी यूरोप पहले से ही भारी सैन्य गतिविधियों के बीच हैं।
ऊर्जा बाजार पर इसका असर पहले ही दिख रहा है। तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है। यूरोप अब रूस पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है। दूसरी तरफ हथियार उद्योग को रूस-यूक्रेन युद्ध से भारी फायदा हो रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह संघर्ष आने वाले वर्षों तक दुनिया की राजनीति को प्रभावित कर सकता है।
विश्लेषण
रूस-यूक्रेन युद्ध अब “जल्दी खत्म होने वाला युद्ध” नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे एक लंबी और थकाऊ लड़ाई में बदल चुका है, जहाँ दोनों पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं दिखते।
रूस नई मिसाइलों और भारी हमलों के जरिए दबाव बनाना चाहता है। यूक्रेन पश्चिमी सहायता के सहारे लड़ाई जारी रखना चाहता है। लेकिन सबसे बड़ी कीमत आम नागरिक चुका रहे हैं।
चार साल बाद भी इस युद्ध का स्पष्ट अंत दिखाई नहीं देता। यही वजह है कि दुनिया अब केवल युद्ध नहीं, बल्कि उसके लंबे असर से भी डरने लगी है। यूरोप की सुरक्षा, वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति — सब इस संघर्ष से प्रभावित हो रहे हैं।
और शायद यही रूस-यूक्रेन युद्ध की सबसे बड़ी सच्चाई है — यह लड़ाई अब केवल रूस और यूक्रेन की सीमाओं तक सीमित नहीं रही।
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