प्रोजेक्ट 75-I पनडुब्बी पर द इस्टर्न स्ट्रैटेजिस्ट की विशेष रिपोर्ट
मई 2026 में मिडिल ईस्ट के हालात और ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) में जारी अघोषित नाकेबंदी ने भारत के एनर्जी सिक्योरिटी ग्रिड को हिलाकर रख दिया है। भारतीय नौसेना ने अपने कमर्शियल जहाजों को बचाने के लिए ‘ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा’ के तहत अरब सागर में अपने डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट तैनात कर दिए हैं। लेकिन डिफेंस स्ट्रेटेजी का एक कड़वा सच यह है कि समुद्र की सतह (Surface) पर लड़ी जाने वाली जंग असल में पानी के नीचे (Underwater) जीती जाती है।
यहीं एंट्री होती है भारतीय नौसेना के सबसे महत्वाकांक्षी और जरूरी मेगा-डिफेंस प्रोग्राम की—प्रोजेक्ट 75-इंडिया (Project 75-I)। होर्मुज संकट ने 43,000 करोड़ रुपये के इस रुके हुए प्रोजेक्ट में नई जान फूंक दी है। आइए TES Insight के इस डीप-डाइव में समझते हैं कि प्रोजेक्ट 75-I क्या है, इसमें मझगांव डॉक (MDL) और लार्सन एंड टूब्रो (L&T) के बीच क्या टक्कर है, और भारतीय नौसेना को इन 6 ‘किलर’ पनडुब्बियों की तुरंत जरूरत क्यों है।
1. अरब सागर का बदलता ‘थ्रेट मैट्रिक्स’: सरफेस फ्लीट काफी नहीं
होर्मुज जलडमरूमध्य में हाल ही में कमर्शियल जहाजों पर हुए हमलों ने साबित कर दिया है कि रडार से लैस बड़े जंगी जहाज (Destroyers) सस्ते ड्रोन और एंटी-शिप मिसाइलों का आसान शिकार बन सकते हैं। सतह पर तैरते जहाजों की लोकेशन सैटेलाइट और ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) से आसानी से ट्रैक की जा सकती है।
ऐसे माहौल में भारत को एक ‘साइलेंट किलर’ की जरूरत है—यानी ऐसी पनडुब्बियां जो बिना रडार की पकड़ में आए दुश्मन के इलाके (Gulf of Oman और Arabian Sea) में हफ्तों तक गहराई में छिपी रह सकें और जरूरत पड़ने पर दुश्मन के समुद्री रास्तों को ब्लॉक कर सकें। वर्तमान में भारतीय नौसेना के पास करीब 16 पारंपरिक (Diesel-Electric) पनडुब्बियां हैं, लेकिन आधुनिक युद्ध के लिए प्रोजेक्ट 75-I पनडुब्बी की आवश्यकता है।
‘प्रोजेक्ट 75-I’ आखिर है क्या और ये इतनी घातक क्यों हैं?

प्रोजेक्ट 75-I पनडुब्बी भारतीय नौसेना का 43,000 करोड़ रुपये का कार्यक्रम है, जिसके तहत 6 नेक्स्ट-जेनरेशन (Next-Generation) स्टील्थ पनडुब्बियों का निर्माण भारत में ही किया जाना है।
इन 6 पनडुब्बियों को जो चीज ‘किलर’ बनाती है, वह है AIP (Air Independent Propulsion) टेक्नोलॉजी।
- पारंपरिक पनडुब्बियों की कमजोरी: आम डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को अपनी बैटरी चार्ज करने के लिए हर 2-3 दिन में समुद्र की सतह पर (स्नोर्कलिंग के लिए) आना पड़ता है। सतह पर आते ही दुश्मन के रडार और एयरक्राफ्ट उन्हें ट्रैक कर लेते हैं।
- AIP का गेम-चेंजर फैक्टर: AIP सिस्टम से लैस प्रोजेक्ट 75-I की पनडुब्बियां पानी के भीतर ही ऑक्सीजन जेनरेट कर सकती हैं। इसका मतलब है कि ये पनडुब्बियां बिना सतह पर आए दो से तीन हफ्तों तक पानी के नीचे छिपी रह सकती हैं।
इसके अलावा, इन पनडुब्बियों में ‘लैंड-अटैक क्रूज मिसाइलें’ (Land-Attack Cruise Missiles) और उन्नत टॉरपीडो (Torpedoes) लगे होंगे, जो इन्हें होर्मुज से लेकर मलक्का स्ट्रेट तक एक घातक स्ट्राइक फोर्स बनाते हैं।
3. MDL बनाम L&T: 43,000 करोड़ का महा-मुकाबला
होर्मुज संकट के कारण रक्षा मंत्रालय (MoD) पर इस प्रोजेक्ट को जल्द से जल्द क्लीयर करने का दबाव है। शेयर बाजार (Stock Market) और डिफेंस इक्विटी के निवेशक इस प्रोजेक्ट पर पैनी नजर गड़ाए हुए हैं, क्योंकि यह भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास के सबसे बड़े रक्षा सौदों में से एक है। रेस में दो भारतीय शिपयार्ड और उनके विदेशी पार्टनर (Original Equipment Manufacturers – OEMs) बचे हैं:
- लार्सन एंड टूब्रो (L&T) + नवंतिया (Navantia – स्पेन): L&T एक प्राइवेट सेक्टर का दिग्गज है, जिसके पास कट्टुपल्ली (Kattupalli) में वर्ल्ड-क्लास शिपयार्ड है (जिसे हाल ही में US Navy ने भी रिपेयर के लिए चुना है)। स्पेनिश कंपनी नवंतिया अपनी ‘S-80 Plus’ क्लास की पनडुब्बी की डिजाइन के साथ L&T को सपोर्ट कर रही है। नवंतिया का AIP सिस्टम बायो-इथेनॉल पर काम करता है, जिसे एक बड़ा प्लस पॉइंट माना जा रहा है।
- मझगांव डॉक (MDL) + थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS – जर्मनी): MDL भारत की सरकारी ‘पनडुब्बी फैक्ट्री’ है, जिसने हाल ही में ‘कलवरी क्लास’ (Project 75) की 6 पनडुब्बियां नौसेना को सौंपी हैं। उनका पार्टनर जर्मनी का TKMS है, जो अपनी ‘Class 214’ पनडुब्बी का ऑफर दे रहा है। जर्मन पनडुब्बियां अपनी इंजीनियरिंग और साइलेंट रनिंग के लिए दुनिया भर में मशहूर हैं।
मार्च 2026 में फील्ड इवैल्यूएशन ट्रायल (FET) पूरे हो चुके हैं, और अब दोनों कंपनियां कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने के लिए आखिरी दौर की कूटनीतिक और तकनीकी लॉबिंग कर रही हैं।
4. होर्मुज नाकेबंदी ने कैसे इस प्रोजेक्ट में लगाया ‘बूस्टर’?
प्रोजेक्ट 75-I पनडुब्बी का निर्माण पिछले एक दशक से फंसा हुआ था लेकिन मई 2026 के मिडिल ईस्ट संकट ने नीति निर्माताओं की नींद उड़ा दी है।
- चीन का बढ़ता दखल: चीनी नौसेना (PLAN) की नजर पहले से ही हिंद महासागर पर है और वह पाकिस्तान को 8 ‘हंगोर क्लास’ (Hangor-class) की पनडुब्बियां दे रहा है।
- फास्ट-ट्रैक अप्रूवल: होर्मुज क्राइसिस के बाद अब डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) पर इस सौदे को “इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट” की तरह फास्ट-ट्रैक करने का भारी दबाव है। सरकार जानती है कि ऑर्डर मिलने के बाद भी पहली पनडुब्बी को पानी में उतरने में कम से कम 7 से 8 साल लगेंगे।
TES Insight: निष्कर्ष
हिंद महासागर और अरब सागर का भू-राजनीतिक (Geopolitical) भूगोल तेजी से बदल रहा है। ‘ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा’ जैसे कदम तत्काल राहत दे सकते हैं, लेकिन भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) लंबी अवधि में प्रोजेक्ट 75-I पर टिकी है।
चाहे यह 43,000 करोड़ का मेगा-ऑर्डर मझगांव डॉक (MDL) के खाते में जाए या लार्सन एंड टूब्रो (L&T) की झोली में गिरे, असली जीत भारतीय नौसेना की होगी। ‘मेक इन इंडिया’ के तहत बनने वाली ये 6 AIP पनडुब्बियां न केवल विदेशी नौसेनाओं के खिलाफ एक ‘साइलेंट वॉल’ का काम करेंगी, बल्कि यह सुनिश्चित करेंगी कि भारत की ऊर्जा सप्लाई चेन को भविष्य में कोई भी देश ब्लैकमेल न कर सके।
