हिंद महासागर का वो वीरान द्वीप, जहां भारत और ऑस्ट्रेलिया मिलकर तैयार कर रहे हैं नया चक्रव्यूह

Cocos Islands Geopolitics

समंदर के नक्शे पर नजर दौड़ाएं तो हमारा ध्यान अक्सर अंडमान, मलक्का जलडमरूमध्य या फिर डिएगो गार्सिया पर जाकर टिक जाता है। दक्षिण के समुद्री विस्तार की तरफ बहुत कम लोग देखते हैं।

यहीं पर ऑस्ट्रेलिया का एक छोटा सा द्वीप समूह है- कोकोस (कीलिंग) आइलैंड्स। आबादी मुश्किल से 600 के आस-पास।

कुछ सालों पहले तक यह जगह सिर्फ अपनी मूंगे की चट्टानों और नारियल के पेड़ों के लिए जानी जाती थी। अब यहां भारी मशीनों की आवाजें आ रही हैं। ऑस्ट्रेलिया करीब 400 मिलियन डॉलर खर्च करके यहां के रनवे को चौड़ा और लंबा कर रहा है।

आखिर इस शांत द्वीप पर अचानक इतना काम क्यों हो रहा है? इसका जवाब समंदर के नीचे चलने वाले उस खामोश खेल में छिपा है, जिस पर नई दिल्ली से लेकर कैनबरा तक की नजर है।

समंदर के नीचे का रास्ता चीन की न्यूक्लियर पनडुब्बियां जब हिंद महासागर में घुसने की कोशिश करती हैं, तो वो मलक्का से कतराती हैं। मलक्का संकरा है, पानी उथला है और वहां कमर्शियल जहाजों का भारी ट्रैफिक रहता है। ऐसे में एक बड़ी पनडुब्बी का बिना रडार की नजर में आए वहां से निकलना लगभग नामुमकिन है।

विकल्प बचते हैं सुंडा और लोम्बोक स्ट्रेट। ये इंडोनेशिया के पास गहरे पानी वाले रास्ते हैं। पनडुब्बियां आसानी से यहां गोता लगा सकती हैं और रडार को चकमा दे सकती हैं। एक बार जब कोई पनडुब्बी इन रास्तों से निकलकर हिंद महासागर के खुले पानी में दाखिल हो जाती है, तो उसे ट्रैक करना भूसे के ढेर में सुई ढूंढने जैसा हो जाता है।

भारत के लिए लंबे समय से यही एक ‘ब्लाइंड स्पॉट’ था।

उत्तर में हमारा अंडमान निकोबार है, जो मलक्का पर पैनी नजर रखता है। लेकिन दक्षिण के इतने बड़े समुद्री इलाके की 24 घंटे निगरानी करना अकेले मुमकिन नहीं था। भारत से कोकोस की दूरी काफी ज्यादा है, इसलिए वहां लगातार जहाज तैनात रखना लॉजिस्टिकली बहुत महंगा और मुश्किल काम था।

यहीं पर Cocos Islands Geopolitics का असली दांव चला गया।

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच ‘म्यूचुअल लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट’ (MLSA) साइन हुआ। आसान भाषा में कहें तो दोनों देश एक-दूसरे के मिलिट्री बेस का इस्तेमाल ईंधन भरने या रिपेयरिंग के लिए कर सकते हैं। इस एक एग्रीमेंट ने पूरे दक्षिणी हिंद महासागर का गणित बदल दिया।

सबमरीन-हंटर की नई पिच भारत के पास बोइंग P-8I ‘नेप्च्यून’ विमान हैं। ये दुनिया के सबसे बेहतरीन सबमरीन-हंटर माने जाते हैं। विमान उड़ता है, पानी में खास तरह के सोनोबॉय (सेंसर) गिराता है और गहराई में छिपी पनडुब्बी की आवाज पकड़ लेता है।

लेकिन हवा में उड़ने की भी एक लिमिट होती है।

अब भारतीय नौसेना के P-8I विमान सीधे कोकोस आइलैंड पर उतर सकते हैं। वहां फ्यूल भर सकते हैं और इंडोनेशिया के दक्षिण में गहरे पानी की निगरानी करके वापस आ सकते हैं। हाल ही में भारतीय नौसेना के P-8I विमानों ने ऑस्ट्रेलिया से उड़ानें भरी भी हैं, और ऑस्ट्रेलियन विमान भारत आए हैं।

इस तालमेल ने समंदर में एक ऐसा सर्विलांस नेट तैयार कर दिया है, जिसे भेदना किसी भी विदेशी नौसेना के लिए आसान नहीं होगा। भारत को वहां अपना खुद का बेस बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ी। ऑस्ट्रेलिया की जमीन और भारत की ऑपरेशनल ताकत मिलकर काम कर रही है।

कोकोस में क्या बदल रहा है? कोकोस में जो कंस्ट्रक्शन चल रहा है, वो सिर्फ रनवे पर डामर बिछाने तक सीमित नहीं है। पी-8 जैसे भारी मिलिट्री एयरक्राफ्ट को उतरने के लिए बहुत मजबूत टरमैक चाहिए। इसके साथ ही वहां ईंधन स्टोर करने के बड़े टैंक और मेंटेनेंस हैंगर बनाए जा रहे हैं।

डिफेंस ऑब्जर्वर बताते हैं कि वहां सिग्नल्स इंटेलिजेंस (SIGINT) की सुविधाएं भी विकसित की जा रही हैं। यानी सैकड़ों मील दूर से गुजरने वाले जहाजों के इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल और कम्युनिकेशन भी यहां कैच किए जा सकेंगे। यह द्वीप अब एक ‘सदन आई’ (Southern Eye) का काम कर रहा है, जो लगातार दक्षिण के पानी को स्कैन कर रहा है।

डिएगो गार्सिया का विकल्प जब भी हिंद महासागर में सर्विलांस की बात आती है, तो अमेरिका के डिएगो गार्सिया बेस का जिक्र जरूर होता है। लेकिन डिएगो गार्सिया के साथ एक बड़ा कानूनी पेंच है। मॉरीशस उस पर अपना दावा ठोकता है और यूएन से लेकर इंटरनेशनल कोर्ट तक ब्रिटेन पर उसे वापस करने का भारी दबाव है।

इसके उलट, कोकोस आइलैंड के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है। यह पूरी तरह से ऑस्ट्रेलिया का संप्रभु (Sovereign) हिस्सा है। यहां कोई अंतरराष्ट्रीय कानूनी विवाद नहीं है। स्थानीय आबादी भी इस मिलिट्री अपग्रेड का समर्थन कर रही है क्योंकि इससे वहां सप्लाई चेन और रोजगार के मौके बन रहे हैं।

क्वाड देशों (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) के नजरिए से देखें, तो कोकोस एक बेहद सुरक्षित, स्थिर और भरोसेमंद विकल्प है। यह डिएगो गार्सिया की तरह किसी विवाद में नहीं उलझा है।

दिल्ली के रणनीतिकारों को दक्षिण में एक ऐसे ‘लिसनिंग पोस्ट’ की जरूरत थी जो भारत के सर्विलांस ग्रिड को पूरा कर सके। कोकोस आइलैंड्स के मिलिटराइजेशन ने उस खालीपन को भर दिया है। अंडमान निकोबार से उत्तरी एंट्री लॉक है और अब दक्षिण के रास्ते भी रडार पर आ गए हैं। समुद्री सुरक्षा का ढांचा अब पहले से कहीं ज्यादा कड़ा है।

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