कूनो राष्ट्रीय उद्यान फिर सुर्खियों में: 25 दिनों में 5 चीते क्यों खो चुका है भारत?

कूनो राष्ट्रीय उद्यान एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बन गया है। मादा चीता KGP-11 की मौत के बाद भारत की महत्वाकांक्षी चीता पुनर्स्थापन परियोजना पर नए सवाल उठ रहे हैं। पिछले 25 दिनों में पांच चीतों के नुकसान ने संरक्षण विशेषज्ञों, वन अधिकारियों और आम लोगों के बीच बहस तेज कर दी है कि क्या भारत का सबसे चर्चित वन्यजीव कार्यक्रम अपेक्षित दिशा में आगे बढ़ रहा है।

ताजा मामला कूनो राष्ट्रीय उद्यान से जुड़े भारतीय मूल की मादा चीता KGP-11 से संबंधित है, जो हाल ही में मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के पहाड़गढ़ क्षेत्र में घायल अवस्था में मिली थी। वन विभाग की टीम ने उसे रेस्क्यू कर उपचार शुरू किया, लेकिन गंभीर आंतरिक चोटों और स्वास्थ्य जटिलताओं के कारण उसकी मौत हो गई। अधिकारियों के अनुसार यह चीता कूनो राष्ट्रीय उद्यान के निर्धारित क्षेत्र से बाहर निकलकर जंगलों और मानव आबादी वाले इलाकों के करीब पहुंच गई थी, जहां उसके घायल होने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि मौत के सटीक कारणों का पता पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बाद ही चल सकेगा।

यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मादा चीता KGP-11 उन चीतों की पीढ़ी का हिस्सा थी जिनका जन्म भारत में हुआ था। यानी यह केवल एक आयातित अफ्रीकी चीते की मौत नहीं, बल्कि कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीता आबादी को स्वाभाविक रूप से विकसित करने के प्रयास को लगा एक बड़ा झटका भी माना जा रहा है।

KGP-11 की मौत ऐसे समय हुई है जब प्रोजेक्ट चीता पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में बीमारी, आपसी संघर्ष, संक्रमण, अत्यधिक गर्मी और निगरानी संबंधी समस्याओं के कारण कई चीतों और शावकों की मौत हो चुकी है। यही वजह है कि हर नई मृत्यु के साथ कूनो राष्ट्रीय उद्यान और प्रोजेक्ट चीता की दीर्घकालिक सफलता को लेकर बहस और तेज हो जाती है।

हालांकि वन्यजीव विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि किसी भी बड़े पुनर्स्थापन कार्यक्रम के शुरुआती वर्षों में ऐसी चुनौतियां असामान्य नहीं होतीं। उनका तर्क है कि असली परीक्षा इस बात की होगी कि क्या आने वाले वर्षों में कूनो राष्ट्रीय उद्यान और अन्य संभावित आवास क्षेत्रों में एक स्थायी और प्रजनन करने वाली चीता आबादी विकसित हो पाती है या नहीं।

लेकिन KGP-11 की मौत ने एक बार फिर यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि भारत के इस ऐतिहासिक संरक्षण अभियान के सामने सबसे बड़ी चुनौती आखिर चीते हैं, उनका आवास है, या फिर तेजी से बदलता पर्यावरण।

भारत से चीते कैसे गायब हुए: एक ऐतिहासिक भूल

भारत में चीतों का इतिहास सदियों पुराना है, लेकिन उनका अंत अचानक और त्रासद था।

  • मुगल काल का वैभव: इतिहासकार बताते हैं कि मुगल बादशाह अकबर के पास अपने शासनकाल में लगभग 1,000 प्रशिक्षित चीते (जिन्हें ‘खासा’ कहा जाता था) थे, जिनका उपयोग शिकार के लिए किया जाता था।
  • आखिरी शिकार (1947): आजादी के ठीक बाद, 1947 में वर्तमान छत्तीसगढ़ की कोरिया रियासत के महाराजा रामानुज प्रताप सिंह देव ने भारत के अंतिम तीन ज्ञात एशियाई चीतों का शिकार किया था।
  • आधिकारिक विलुप्ति (1952): लगातार शिकार, ब्रिटिश काल में ‘ट्रॉफी हंटिंग’ और कृषि विस्तार के कारण घास के मैदानों (Grasslands) के खत्म होने के बाद, 1952 में भारत सरकार ने चीते को देश से आधिकारिक रूप से विलुप्त (Extinct) घोषित कर दिया।

70 साल बाद वापसी: कूनो राष्ट्रीय उद्यान में ‘प्रोजेक्ट चीता’ का जन्म

चूंकि मूल एशियाई चीता (Asiatic Cheetah) अब केवल ईरान में कुछ दहाई की संख्या में बचा है, इसलिए भारत ने अफ्रीकी उप-प्रजाति (African Cheetah) को अपने यहां बसाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया।

यह कोई साधारण वन्यजीव स्थानांतरण नहीं था, बल्कि एक ‘शीर्ष शिकारी’ (Apex Predator) को वापस लाकर भारत के सवाना और घास के मैदानों के पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने का एक वैज्ञानिक प्रयास था।

चीता कूटनीति: अफ्रीका में भारत का नया “सॉफ्ट पावर”

प्रोजेक्ट चीता सिर्फ पर्यावरण मंत्रालय की पहल नहीं है, यह विदेश नीति का एक नया और धारदार हथियार भी है।

  • पांडा डिप्लोमेसी का भारतीय विकल्प: जिस तरह चीन अपने ‘जायंट पांडा’ का इस्तेमाल वैश्विक कूटनीति के लिए करता है, भारत ने अफ्रीका के साथ “चीता सहयोग मॉडल” खड़ा किया है।
  • रणनीतिक साझेदारी: नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका के साथ हुए समझौता ज्ञापनों (MoUs) ने न केवल वन्यजीव विज्ञान में, बल्कि खनिज, ऊर्जा और व्यापारिक मोर्चों पर भी भारत की स्थिति को अफ्रीका में मजबूत किया है। यह ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) के दो बड़े हिस्सों के बीच एक भावनात्मक और कूटनीतिक पुल बन गया है।

सफलता या विफलता: आंकड़ों और विज्ञान की नजर से

चीतों की मौत और शावकों के जन्म के बीच यह प्रोजेक्ट लगातार विवादों में रहा है।

चुनौतियां और आलोचकों के तर्क:

  • स्थान की कमी: कुनो नेशनल पार्क का क्षेत्रफल 748 वर्ग किलोमीटर है, जबकि एक चीते को घूमने और शिकार के लिए औसतन 100 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र चाहिए।
  • रेडियो कॉलर और संक्रमण: भारत की उमस भरी गर्मी और मानसून के दौरान रेडियो कॉलर के नीचे संक्रमण (Septicemia) ने कुछ चीतों की जान ली, जो अफ्रीकी मौसम से बिल्कुल अलग चुनौती थी।

समर्थकों और वैज्ञानिकों का पक्ष:

  • वैश्विक मानक: दुनिया भर में किसी भी बड़े मांसाहारी ट्रांसलोकेशन में पहले साल में 50% मृत्यु दर को सामान्य माना जाता है।
  • नई पीढ़ी का जन्म: भारतीय धरती पर नए शावकों का जन्म इस बात का प्रमाण है कि चीते यहां के माहौल में ढल (Acclimatize) रहे हैं। सफलता का आकलन 1-2 साल में नहीं, बल्कि कम से कम 10-15 साल के डेटा पर किया जाना चाहिए।

असली संकट: जलवायु परिवर्तन और भविष्य की राह

चीतों की कहानी केवल चीतों तक सीमित नहीं है। भारत के घास के मैदान, जिन्हें अक्सर बंजर भूमि (Wasteland) समझ कर नजरअंदाज कर दिया जाता है, भारी दबाव में हैं।

  • बढ़ता तापमान और अनियमित मानसून शिकार प्रजातियों के प्रजनन को प्रभावित कर रहे हैं।
  • जल स्रोतों का सूखना जानवरों को इंसानी बस्तियों (Human-Wildlife Conflict) की ओर धकेल रहा है।

निष्कर्ष: KGP-11 की मौत हमें याद दिलाती है कि 21वीं सदी में वन्यजीव संरक्षण केवल जंगल के भीतर की बाड़बंदी नहीं है। प्रोजेक्ट चीता का भविष्य केवल इस बात से तय नहीं होगा कि कितने चीते बचे, बल्कि इस बात से तय होगा कि क्या भारत अपनी कूटनीतिक सफलता के साथ-साथ अपने सिकुड़ते घास के मैदानों, स्थानीय समुदायों और बदलती जलवायु के बीच संतुलन बना पाएगा। भारत के लिए यह प्रोजेक्ट केवल एक जानवर को बचाने का नहीं, बल्कि अपने पूरे पारिस्थितिक भविष्य को सुरक्षित करने का लिटमस टेस्ट है।

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