पेंटागन ईमेल से NATO में दरार: ईरान युद्ध पर साथ न देने से स्पेन पर क्यों भड़का अमेरिका?

एक आंतरिक पेंटागन ईमेल ने NATO के भीतर बढ़ते तनाव को सामने ला दिया है। रॉयटर्स के मुताबिक, इस ईमेल में उन NATO सहयोगियों के खिलाफ संभावित दंडात्मक कदमों का जिक्र था, जिन्हें अमेरिका ईरान युद्ध में पर्याप्त समर्थन नहीं देने वाला मान रहा है। इनमें स्पेन की NATO भूमिका पर सवाल उठाने और ब्रिटेन के फॉकलैंड द्वीपों पर अमेरिकी रुख की समीक्षा जैसे विकल्प शामिल बताए गए हैं।

यह ईमेल इस बात का प्रमाण नहीं है कि स्पेन को कल NATO से बाहर कर दिया जाएगा। लेकिन यह पश्चिमी गठबंधन के भीतर एक गहरी समस्या जरूर दिखाता है: NATO ईरान युद्ध विवाद अब इस सवाल में बदल गया है कि यूरोपीय सहयोगी अमेरिका की सैन्य कार्रवाइयों में कितनी दूर तक साथ जाएंगे।

विवाद का केंद्र है access, basing and overflight rights, जिसे सैन्य भाषा में ABO कहा जाता है। इसका मतलब है किसी सहयोगी देश की जमीन, सैन्य अड्डों और हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल। अमेरिका के लिए यह गठबंधन सहयोग की बुनियादी कसौटी है। लेकिन कई यूरोपीय देशों के लिए ईरान युद्ध में ऐसे सहयोग का मतलब केवल logistics नहीं, बल्कि युद्ध में राजनीतिक भागीदारी भी हो सकता है।

ईमेल में क्या कहा गया?

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, पेंटागन के आंतरिक ईमेल में अमेरिका के उन NATO सहयोगियों पर दबाव बनाने के विकल्पों पर चर्चा की गई, जिन्हें वाशिंगटन ईरान युद्ध में पर्याप्त सहयोग नहीं देने वाला मानता है। सबसे बड़ा नाम स्पेन का है। रिपोर्ट के मुताबिक, ईमेल में स्पेन को NATO से suspend करने जैसे विचार का जिक्र था। साथ ही ब्रिटेन के फॉकलैंड द्वीपों पर अमेरिकी समर्थन की समीक्षा का विकल्प भी सामने आया।

स्पेन इसलिए केंद्र में आया क्योंकि वह अमेरिका के महत्वपूर्ण सैन्य ढांचे से जुड़ा है। स्पेन में Naval Station Rota और Morón Air Base जैसे अहम अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, स्पेन ने ईरान युद्ध से जुड़े अमेरिकी अभियानों के लिए अपने अड्डों और airspace के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई। स्पेन की सरकार ने इस रिपोर्ट पर सावधानी से प्रतिक्रिया दी और कहा कि वह ईमेल नहीं, बल्कि आधिकारिक दस्तावेजों और सरकारी रुख के आधार पर काम करती है।

ईमेल में कथित रूप से उन सहयोगी देशों को NATO की प्रतिष्ठित command और committee भूमिकाओं से हटाने जैसे विकल्पों का भी जिक्र था, जिन्हें अमेरिका “difficult” मान रहा है। इसका संदेश साफ था: ईरान युद्ध में हिचकिचाहट की कीमत बढ़ाई जा सकती है।

क्या स्पेन को सच में NATO से निकाला जा सकता है?

कानूनी रूप से यह मामला सीधा नहीं है। North Atlantic Treaty के Article 13 में किसी सदस्य देश के अपनी इच्छा से NATO छोड़ने की प्रक्रिया दी गई है। इसके तहत कोई देश अमेरिका को notice देकर एक साल बाद संधि से बाहर हो सकता है। लेकिन treaty में किसी सदस्य को अमेरिका द्वारा सीधे suspend या expel करने का साफ प्रावधान नहीं है।

इसलिए ईमेल का महत्व कानूनी से ज्यादा राजनीतिक है। असली सवाल यह नहीं है कि स्पेन कल NATO से बाहर होगा या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या अमेरिका अब सहयोगियों की हिचकिचाहट को loyalty problem की तरह देखने लगा है।

Hormuz ने विवाद को और गंभीर बना दिया

ईरान युद्ध का असर अब केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं है। Strait of Hormuz वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बेहद अहम रास्ता है। इस जलडमरूमध्य से दुनिया के तेल और liquefied natural gas transit का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है। इसलिए वहां तनाव बढ़ना यूरोप और एशिया दोनों के लिए ऊर्जा और shipping risk बन जाता है।

रॉयटर्स की एक अलग रिपोर्ट के अनुसार, इटली ने Hormuz Strait को सुरक्षित करने के लिए जरूरत पड़ने पर minesweepers भेजने की तैयारी जताई है। यह दिखाता है कि खाड़ी का संकट कितनी तेजी से एक अंतरराष्ट्रीय maritime security issue बन गया है।

यूरोपीय देशों की दुविधा यहीं से शुरू होती है। वे Hormuz को खुला रखना चाहते हैं, क्योंकि ऊर्जा कीमतों और shipping लागत का असर उनकी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। लेकिन वे यह भी नहीं चाहते कि उनके अड्डों या airspace का इस्तेमाल ईरान पर offensive operations के लिए हो और घरेलू राजनीति में उन पर युद्ध में शामिल होने का आरोप लगे।

यूरोप के नेताओं के लिए यह सवाल आसान नहीं है। वे रूस के खिलाफ अमेरिकी सुरक्षा चाहते हैं। लेकिन वे अपने मतदाताओं को यह भी नहीं समझाना चाहते कि यूरोपीय जमीन का इस्तेमाल ईरान युद्ध के लिए क्यों हो रहा है।

अमेरिका की नाराजगी और यूरोप की चिंता

अमेरिका इस हिचकिचाहट को free-riding के रूप में देखता है। Washington का तर्क है कि यूरोपीय सहयोगी NATO की सुरक्षा चाहते हैं, लेकिन कठिन सैन्य फैसलों में पीछे हट जाते हैं। दूसरी तरफ यूरोप इसे escalation risk के रूप में देखता है। उसके लिए ईरान युद्ध में automatic support देना सीधा सैन्य और राजनीतिक जोखिम बन सकता है।

यही NATO के भीतर नई दरार है। गठबंधन collective defence के लिए बना था। लेकिन ईरान युद्ध यह टेस्ट कर रहा है कि क्या अमेरिका अब NATO सहयोगियों से अपने यूरोप से बाहर के सैन्य अभियानों में भी automatic support की अपेक्षा कर रहा है।

मुख्य बात: NATO का संकट केवल ईरान युद्ध पर मतभेद नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या अमेरिकी सुरक्षा अब यूरोप से बाहर अमेरिकी युद्धों में समर्थन से जुड़ती जा रही है।

फॉकलैंड संकेत क्यों बड़ा है?

ईमेल में फॉकलैंड द्वीपों का कथित जिक्र खास तौर पर संवेदनशील है। फॉकलैंड द्वीप ब्रिटेन के प्रशासन में हैं, जबकि अर्जेंटीना उन पर दावा करता है। यदि अमेरिका ईरान युद्ध पर दबाव बनाने के लिए इस मुद्दे पर अपना रुख बदलने की बात करता है, तो यह सामान्य alliance bargaining से आगे की बात होगी।

संदेश यह जाएगा कि अगर कोई सहयोगी एक मोर्चे पर साथ नहीं देता, तो किसी दूसरे पुराने कूटनीतिक मुद्दे पर उसका समर्थन भी कमजोर किया जा सकता है। ब्रिटेन के लिए यह असहज संकेत होगा। बाकी NATO देशों के लिए भी यह सवाल उठेगा कि अगली बार कौन सा संवेदनशील मुद्दा leverage बन सकता है।

Article 5 पर भरोसे का सवाल

स्पेन का मुद्दा जितना बड़ा दिख रहा है, उससे बड़ा सवाल भरोसे का है। रॉयटर्स ने अलग रिपोर्ट में बताया कि पोलैंड के प्रधानमंत्री Donald Tusk ने यह सवाल उठाया कि रूस के हमले की स्थिति में क्या अमेरिका NATO का वफादार सहयोगी बना रहेगा। पोलैंड कोई प्रतीकात्मक सदस्य नहीं है। वह रूस के सामने खड़ा frontline NATO देश है।

यदि यूरोपीय देशों को यह लगने लगे कि अमेरिकी सुरक्षा उन युद्धों में सहयोग पर निर्भर है जिन्हें यूरोप ने नहीं चुना, तो NATO के भरोसे पर असर पड़ेगा। Article 5 कागज पर रहेगा, लेकिन deterrence केवल कागज से नहीं चलता। वह विश्वास से चलता है।

यही कारण है कि यह ईमेल केवल Pentagon inbox तक सीमित नहीं रहेगा। यह हर छोटे सहयोगी की उस चुप चिंता को छूता है कि सुरक्षा की छतरी के साथ कहीं राजनीतिक कीमत भी तो नहीं जुड़ी है।

भारत और Global South के लिए संदेश

इस विवाद को भारत भी ध्यान से देखेगा। भारत के लिए Hormuz संकट आर्थिक और रणनीतिक दोनों तरह से महत्वपूर्ण है। भारत को सुरक्षित ऊर्जा आपूर्ति, स्थिर shipping lanes और Arabian Sea में मजबूत maritime readiness की जरूरत है। लेकिन भारत ने अपनी विदेश नीति को bloc discipline पर नहीं, बल्कि multi-alignment पर बनाया है।

नई दिल्ली अमेरिका, यूरोप, रूस, इजरायल, ईरान, Gulf देशों और ASEAN के साथ अलग-अलग स्तरों पर काम करती है। कोई एक संबंध बाकी सभी संबंधों की जगह नहीं ले सकता। यही भारत की strategic flexibility है।

यह NATO विवाद multi-alignment की जरूरत को और मजबूत करता है। ईरान युद्ध के बीच भारत-चीन रिश्तों पर बदलती रणनीतिक गणना भी यही दिखाती है कि बड़े संकटों में देश अपने हितों को bloc loyalty से ऊपर रखकर देखते हैं।

ईरान युद्ध को समझने के लिए IRGC की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। ईरान की सैन्य और वैचारिक शक्ति के इस केंद्र को समझे बिना Middle East crisis की पूरी तस्वीर साफ नहीं होती। विस्तार से पढ़ें: IRGC क्या है और ईरान की इस्लामिक क्रांति में इसकी भूमिका क्यों अहम है.

ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके आसपास बनी अमेरिका-पाकिस्तान-ईरान कूटनीतिक परत भी इस संकट की पृष्ठभूमि में अहम है। इस पर हमारी विस्तृत रिपोर्ट पढ़ें: ईरान परमाणु कार्यक्रम, पाकिस्तान और अमेरिका का जटिल रिश्ता.

भारत के लिए संदेश साफ है: उधार की सुरक्षा पर्याप्त नहीं है। अपनी maritime capacity, defence production, surveillance systems और strategic autonomy को मजबूत करना अब विकल्प नहीं, जरूरत है।

निष्कर्ष: NATO की समस्या अब केवल रूस नहीं है

पेंटागन ईमेल का मतलब यह नहीं कि स्पेन कल NATO से बाहर हो जाएगा। यह कानूनी रूप से जटिल और राजनीतिक रूप से विस्फोटक कदम होगा। लेकिन यह ईमेल एक गंभीर बदलाव जरूर दिखाता है: ईरान युद्ध alliance loyalty को transactional test में बदल रहा है।

अमेरिका के लिए bases, airspace और naval participation से इनकार करने वाले सहयोगी अविश्वसनीय दिख सकते हैं। यूरोप के लिए वही मांग ऐसे युद्ध में खींचे जाने का खतरा है, जिसे उसने शुरू नहीं किया। यही अंतर अब खुलकर सामने आ रहा है।

पुराना NATO bargain सरल था: अमेरिका यूरोप की रक्षा करेगा और यूरोप अमेरिका के साथ खड़ा रहेगा। नई दुनिया इतनी सरल नहीं है। यूरोप रूस के खिलाफ अमेरिकी सुरक्षा चाहता है, लेकिन हर अमेरिकी युद्ध में automatic involvement नहीं चाहता। अमेरिका burden-sharing चाहता है, लेकिन वह burden-sharing को अब यूरोप से बाहर भी अपनी प्राथमिकताओं के समर्थन के रूप में देख रहा है।

यह ईमेल NATO के टूटने का प्रमाण नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि गठबंधन नए दबाव में है।

ईरान युद्ध ने अमेरिका और यूरोप की उम्मीदों के बीच का अंतर सामने ला दिया है। यह अंतर आज NATO को नहीं तोड़ेगा। लेकिन आने वाले हर संकट को कठिन जरूर बनाएगा। यदि alliance loyalty का मतलब यूरोप से बाहर अमेरिकी युद्धों में समर्थन बन गया, तो पश्चिम tactical compliance जीत सकता है, लेकिन वह एक ऐसी चीज खो सकता है जिसे दोबारा बनाना सबसे कठिन है: भरोसा।

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