ईरान में जमीनी हमला: अमेरिका क्यों एक खतरनाक जाल में फंसने जा रहा है?
लेखक: अभिषेक कुमार
रणनीतिक मामले (Strategic Affairs)
“ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” को 30 दिन हो चुके हैं। अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में 10,000 से ज्यादा ठिकानों पर बमबारी कर दी है। इसके बावजूद ग्लोबल मार्केट में ब्रेंट क्रूड (कच्चा तेल) 110 डॉलर प्रति बैरल के पार बना हुआ है। अमेरिका की वायुसेना ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने पर मजबूर नहीं कर पाई है।
अब वॉशिंगटन के सामने एक बड़ा धर्मसंकट है। पेंटागन ईरान में जमीनी हमले की योजना बना रहा है। पूरे ईरान पर कब्ज़ा करना तो नामुमकिन है। लेकिन खार्ग द्वीप पर कब्ज़ा करने की तैयारी तेज़ हो गई है।
यह ईरान का सबसे बड़ा ऑयल एक्सपोर्ट हब है। अमेरिका की 82वीं एयरबॉर्न डिवीजन के सैनिक और हज़ारों मरीन कैलिफोर्निया से मिडिल ईस्ट पहुंच चुके हैं।
वे खार्ग द्वीप पर समुद्र के रास्ते हमले (Amphibious assault) का खाका खींच रहे हैं। सवाल यह है कि अमेरिका यह जोखिम क्यों उठा रहा है? जवाब सीधा है—अमेरिका की अर्थव्यवस्था लंबे समय तक 110 डॉलर का कच्चा तेल बर्दाश्त नहीं कर सकती। अगर हवाई हमलों से काम नहीं बना, तो अमेरिका को अपनी सेना ज़मीन पर उतारनी ही पड़ेगी।
पहाड़ों का जाल और मौतों का डर
ईरान ने भी अमेरिका को उसी की भाषा में जवाब दिया है। हाल ही में ईरान के सरकारी अखबार ने पहले पन्ने पर लिखा— “नर्क में स्वागत है।” उन्होंने सीधी चेतावनी दी है कि जो भी अमेरिकी सैनिक ईरान की धरती पर कदम रखेगा, वह ताबूत में ही वापस जाएगा।
यह सिर्फ एक गीदड़भभकी नहीं है। ईरान का भूगोल ही उसका सबसे बड़ा हथियार है। इराक के सपाट रेगिस्तानों के उलट, ईरान ऊंचे ज़ाग्रोस पहाड़ों से घिरा है। ईरान की सेना (IRGC) ने पहाड़ों के अंदर गहरी ‘मिसाइल सिटी’ बना रखी हैं। यहां तक अमेरिका के सबसे भारी बंकर-बस्टर बम भी नहीं पहुंच सकते।
अगर अमेरिका ने हमला किया, तो उसे भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। खार्ग द्वीप के तटों पर बारूदी सुरंगें बिछी हैं और सुसाइड ड्रोन हर पल तैयार हैं। सैन्य विशेषज्ञ इसकी तुलना प्रथम विश्व युद्ध की ‘गैलीपोली’ की तबाही से कर रहे हैं, जहां हमलावर सेना बुरी तरह फंस गई थी।
घरेलू राजनीति और रक्षा बाज़ार का बूम
अमेरिकी जनता एक और युद्ध के सख्त खिलाफ है। करीब 70% अमेरिकी नागरिक जमीनी हमले का विरोध कर रहे हैं। अमेरिका में पेट्रोल के दाम आसमान छू रहे हैं, जिससे व्हाइट हाउस पर भारी राजनीतिक दबाव है।
इस बीच, वैश्विक बाज़ार में घबराहट है, लेकिन रक्षा क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों (Defense stocks) के शेयर रॉकेट बने हुए हैं। दुनिया भर में हथियारों की डिमांड अचानक कई गुना बढ़ गई है।
रूस और चीन का फायदा
इस पूरी जंग में अमेरिका उलझा हुआ है और उसके दुश्मन इसका सीधा फायदा उठा रहे हैं। रूस अपना तेल महंगे दामों पर बेचकर यूक्रेन युद्ध की आराम से फंडिंग कर रहा है। वहीं, चीन अमेरिकी डॉलर को किनारे करते हुए युआन (Yuan) में पेमेंट करके ईरान से तेल खरीद रहा है।
ज़मीन पर ईरान ने अपने दस लाख जवानों को अलर्ट कर दिया है। उनकी योजना आमने-सामने की जंग लड़ने की नहीं है, बल्कि छापामार युद्ध (Guerrilla war) की है। अगर अमेरिकी मरीन उतरे, तो ईरान तुरंत लेबनान में हिज़्बुल्लाह और यमन में हूतियों को एक्टिव कर देगा। पूरा मिडिल ईस्ट एक साथ जल उठेगा।
रणनीतिक निष्कर्ष (Strategic Bottom Line) अगले 6 से 12 महीनों में, अमेरिका को खार्ग द्वीप पर कब्ज़ा करने का विचार पूरी तरह छोड़ना पड़ेगा। अमेरिकी सैनिकों की मौतों का डर और घरेलू राजनीति का दबाव इतना ज्यादा है कि व्हाइट हाउस यह जोखिम नहीं उठा सकता। इसके बजाय, अमेरिका ईरान को घेरने और उस पर आर्थिक दबाव बनाए रखने की एक लंबी रणनीति अपनाएगा। इसका सीधा मतलब है कि दुनिया भर के बाज़ारों को अब लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर के कच्चे तेल की आदत डाल लेनी चाहिए।