दुनिया को लग रहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में सब सामान्य है। खबरें आ रही हैं कि महायुद्ध के इस दौर में भी भारत के जहाज इस ‘रेड ज़ोन’ से सुरक्षित निकल रहे हैं। लेकिन ठहरिए! जो तस्वीरें दिखाई जा रही हैं और जो असलियत है, उसमें जमीन-आसमान का फर्क है।
अगर आप सोच रहे हैं कि होर्मुज में ग्लोबल ट्रेड पहले की तरह चल रहा है, तो ये आपकी सबसे बड़ी भूल है। होर्मुज अब कोई ‘ओपन हाईवे’ नहीं रहा… ये मिडिल-ईस्ट के महायुद्ध का सबसे बड़ा ‘चेकपॉइंट’ (Checkpoint) बन चुका है। भारत के जहाज वहां से आज़ादी से नहीं, बल्कि एक बेहद ‘कंट्रोल्ड’ (Controlled) और खतरनाक ‘वॉर-ज़ोन’ से गुजर रहे हैं।
आंकड़े जो ‘खौफ’ की गवाही दे रहे हैं
भारत सरकार के ताज़ा आंकड़े उस हकीकत को सामने लाते हैं जिसे दुनिया नज़रअंदाज़ कर रही है। मार्च की शुरुआत से लेकर अप्रैल के पहले हफ्ते तक, भारत के सिर्फ 7 LPG टैंकर इस रास्ते से गुजर पाए हैं। बाकी सब नॉर्मल नहीं है! फारस की खाड़ी के पश्चिमी छोर पर 17 भारतीय जहाज अभी भी फंसे हुए हैं, जो आगे बढ़ने के लिए ‘ग्रीन सिग्नल’ का इंतज़ार कर रहे हैं।
460 से ज़्यादा भारतीय नाविकों पर इस वक्त 24 घंटे नज़र रखी जा रही है। ज़रा सोचिए, अगर समंदर का रास्ता सुरक्षित होता, तो जहाजों को एक ‘वॉर-ज़ोन’ के मुहाने पर हफ्तों तक लाइन में क्यों खड़ा रहना पड़ता? यह ‘ओपन ट्रेड’ नहीं है, यह एक खौफनाक बॉटलनेक (Bottleneck) है।
‘पाइन गैस’ टैंकर: मौत के कुएं से गुज़रने की कहानी
‘पाइन गैस’ टैंकर: मौत के कुएं से गुज़रने की कहानी
स्थिति की गंभीरता को समझना हो, तो भारतीय LPG टैंकर ‘Pine Gas’ की यात्रा को देखिए। लगभग तीन हफ्ते तक समंदर में फंसे रहने के बाद, जब इस टैंकर को आगे बढ़ने का मौका मिला, तो इसे सामान्य कमर्शियल रूट से नहीं जाने दिया गया।
इसे ईरान के तट के बेहद करीब से एक अनजान और संकरे रास्ते (Narrow channel) से निकाला गया। यह इस बात का सबूत है कि होर्मुज अब एक आज़ाद समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि एक ‘कंट्रोल्ड कॉरिडोर’ बन गया है।
ईरान का ‘फिल्टर’ और परमिशन वाला रास्ता
होर्मुज का पूरा कैरेक्टर बदल चुका है। अब वहां जहाजों की आवाजाही ‘नेविगेशन’ से नहीं, ‘डिप्लोमेसी’ और ‘आइडेंटिटी’ (Identity) से तय हो रही है।रिपोर्ट्स साफ़ इशारा कर रही हैं कि ईरान इस रास्ते पर एक ‘फिल्टर’ लगा चुका है। वो सिर्फ ‘गैर-दुश्मन’ (Non-hostile) देशों के जहाजों को सिलेक्टिव एंट्री दे रहा है। एक मामले में तो भारतीय जहाज को इस ‘मौत के कुएं’ से गुजरते वक्त अपनी आइडेंटिटी को खुले तौर पर ब्रॉडकास्ट करना पड़ा। साफ है, होर्मुज अब कोई न्यूट्रल ज़ोन नहीं है। यह परमिशन-बेस्ड एंट्री गेट बन चुका है, जहाँ आपकी पहचान ही आपकी सुरक्षा है।
समंदर में भारतीय नेवी का ‘लाइव ऑपरेशन’
इस पूरी क्राइसिस के बीच नई दिल्ली (भारत सरकार) का एक्शन देखने लायक है। सरकार इसे किसी रूटीन शिपिंग की तरह नहीं, बल्कि एक ‘लाइव मिलिट्री ऑपरेशन’ की तरह मॉनिटर कर रही है। रियल-टाइम ट्रैकिंग की जा रही है और पल-पल की रिपोर्ट ली जा रही है।
जब ‘पाइन गैस’ टैंकर सबसे खतरनाक फेज़ में था, तो उसे बाकायदा गाइड किया गया। होर्मुज से बाहर आते ही भारतीय युद्धपोतों (Indian Warships) ने उसे अपनी सुरक्षा में ले लिया और एस्कॉर्ट करके आगे बढ़ाया।
नेविगेशन नहीं, कूटनीति की जीत
इस पूरी तस्वीर का सबसे कड़वा लेकिन सच्चा सबक यही है: भारत के जहाज होर्मुज से इसलिए नहीं निकल रहे हैं क्योंकि वहां रास्ता खुला है। वो इसलिए निकल रहे हैं क्योंकि भारत अपनी ‘एनर्जी लाइफलाइन’ को बचाने के लिए बैकग्राउंड में एक बहुत बड़ी कूटनीतिक और नौसैनिक ताकत झोंक रहा है।नक्शे पर होर्मुज आज भी एक नीले रंग का समुद्री रास्ता दिखता होगा, लेकिन हकीकत में यह एक मिलिट्री चेकपॉइंट है। भारत का इस ‘चक्रव्यूह’ से अपने जहाजों को निकाल लाना, महज़ शिपिंग का हिस्सा नहीं है… यह इस बात का प्रमाण है कि भारत इस महायुद्ध के बीच भी अपनी अर्थव्यवस्था की धड़कन को कैसे ज़िंदा रखे हुए है।
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