ईरान-अमेरिका तनाव के बीच पाकिस्तान खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है। लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग है—इस्लामाबाद की भूमिका सीमित है, जबकि भारत के लिए दांव कहीं बड़े हैं।
मध्य पूर्व में तनाव बढ़ा है। इसी बीच पाकिस्तान खुद को ईरान और अमेरिका के बीच संपर्क-सूत्र के तौर पर पेश कर रहा है। Reuters की 29 मार्च 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक इस्लामाबाद ने क्षेत्रीय देशों के साथ वार्ता की, लेकिन किसी ठोस प्रगति की पुष्टि नहीं हुई।
पाकिस्तान का शोर, हक़ीक़त कितनी?
ईरान ने भी साफ संकेत दिया है कि भरोसे के बिना बातचीत आगे नहीं बढ़ेगी। इससे स्पष्ट है कि पाकिस्तान की भूमिका सीमित है। वह संवाद शुरू करा सकता है, लेकिन समझौता तय नहीं कर सकता।
इस्लामाबाद की कोशिश की असली सीमा
पाकिस्तान को यह भूमिका उसकी ताकत से नहीं, उसकी भौगोलिक स्थिति से मिली है। उसकी सीमा ईरान से लगती है, जिससे वह एक संपर्क माध्यम बन सकता है।
रिपोर्टों के मुताबिक ईरान ने 20 पाकिस्तानी जहाजों को गुजरने की अनुमति दी। यह एक छोटा फायदा है, लेकिन इसे बड़ी कूटनीतिक सफलता कहना मुश्किल है।
भारत के लिए असली दांव क्या हैं
भारत के लिए यह सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि ऊर्जा और रणनीतिक पहुंच का मामला है। भारत ने ईरान के चाबहार पोर्ट में निवेश किया है, जो मध्य एशिया तक उसकी पहुंच का महत्वपूर्ण मार्ग है।
ऊर्जा का जोखिम भी बड़ा है। भारत का बड़ा हिस्सा तेल आयात मध्य पूर्व से आता है। EIA के अनुसार स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब 20% गुजरता है।
नई दिल्ली खुलकर क्यों नहीं उतर रही
भारत को अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संतुलन बनाए रखना है। ऐसे में किसी एक पक्ष का संदेशवाहक बनना उसके हित में नहीं है।
नई दिल्ली के लिए सही रास्ता क्या है
भारत के लिए सबसे समझदार रणनीति यही है—दूरी बनाए रखना, सभी पक्षों से संवाद जारी रखना और अपने दीर्घकालिक हितों को प्राथमिकता देना।