इजराइल के नेगेव रेगिस्तान की उस भीषण खामोशी में, मृत सागर (Dead Sea) से लगभग 35 किलोमीटर पश्चिम में एक ऐसा शहर बसा है जिसकी कल्पना करना भी कठिन है। इस शहर का नाम है ‘डिमोना’। यहाँ की धूल भरी गलियों में आज भी हिब्रू के बीच मराठी के शब्द तैरते सुनाई देते हैं। तपती दोपहरों में जब खिड़कियों से घर में बने भारतीय मसालों की खुशबू आती है, तो रेगिस्तान का सन्नाटा जैसे किसी भारतीय कस्बे में तब्दील हो जाता है। यह इजराइल का ‘छोटा भारत’ है—’बेने इजराइल’ (Bene Israel) समुदाय का वह आशियाना, जिसकी दास्ताँ सदियों, महाद्वीपों और अब एक सीधे युद्ध के बीच से गुजर रही है।
दशकों तक डिमोना की पहचान एक विरोधाभास की तरह रही। एक तरफ यह रेगिस्तान का वह शांत कोना था जहाँ परिवारों ने सामान्य जीवन बुना, अपनी जड़ें जमाईं और भारतीय परंपराओं को नई ज़मीन पर सींचा। लेकिन दूसरी तरफ, यह मध्य-पूर्व के सबसे संवेदनशील और ‘ज्वलंत’ रणनीतिक रहस्यों का केंद्र भी था। दैनिक जीवन की चहल-पहल के पीछे एक खामोश हकीकत हमेशा मौजूद रही: डिमोना का नाम इजराइल की परमाणु सुरक्षा और उसकी सबसे गोपनीय सामरिक शक्ति का पर्यायवाची था।
शनिवार की रात, 21 मार्च 2026 को वह बरसों पुराना ‘सुरक्षा का भ्रम’ अचानक तार-तार हो गया।
जब ईरानी मिसाइलों ने इजराइल के अभेद्य माने जाने वाले ‘लौह कवच’ (Air-defense shield) को चुनौती देते हुए डिमोना के करीब दस्तक दी, तो वह दीवार ढह गई जो इस शहर को क्षेत्रीय संघर्षों से अलग रखे हुए थी। यहाँ बसे बेने इजराइल परिवारों के लिए यह महज दो देशों का सैन्य टकराव नहीं था; यह वह पल था जब युद्ध की विभीषिका सीधे उनकी रसोई और आंगन तक आ पहुँची थी।
कोंकण के तट से नेगेव की तपिश तक: एक अनूठा सफर
डिमोना के इस भावनात्मक और रणनीतिक बोझ को समझने के लिए हमें मिसाइलों की गति और सैन्य मानचित्रों से परे जाना होगा। हमें भारत के कोंकण तट की उन धुंधली यादों को टटोलना होगा, जहाँ से यह कहानी शुरू हुई थी।
बेने इजराइल दुनिया के सबसे प्राचीन यहूदी समुदायों में से एक हैं। लोकश्रुति है कि सदियों पहले एक जहाज हादसे के बाद उनके पूर्वज महाराष्ट्र के कोंकण तट पर पहुँचे थे। उसके बाद जो हुआ, वह यहूदी प्रवास के इतिहास की सबसे गौरवशाली गाथा है: लगभग दो हजार सालों तक वे भारतीय संस्कृति में रचे-बसे रहे, मराठी को अपनी जुबान बनाया, स्थानीय रिवाजों को जिया, लेकिन अपनी धार्मिक अस्मिता को भी अक्षुण्ण रखा। वे बिना अपनी यहूदी पहचान खोए, पूरी तरह ‘भारतीय’ हो गए।
यही कारण है कि उनकी कहानी में एक अलग तरह की शक्ति है। जहाँ दुनिया के कई हिस्सों में अल्पसंख्यक होने का अर्थ उत्पीड़न रहा, वहीं भारत में बेने इजराइल का अनुभव समावेशन और सद्भाव का था। 1950 के दशक में जब इन परिवारों ने इजराइल का रुख किया, तो उन्हें चकाचौंध वाले तटीय शहरों के बजाय डिमोना जैसे दुर्गम और सूखे ‘डेवलपमेंट ज़ोन’ में भेजा गया। वह जगह किसी रेतीले बियाबान जैसी थी, लेकिन उन्होंने इसे अपनी मेहनत से सींचा। समय के साथ डिमोना केवल एक बस्ती नहीं, बल्कि एक जीवंत ‘सांस्कृतिक प्रतिरोपण’ (Cultural Transplant) बन गया, जहाँ रेगिस्तान की गर्मी भी कोंकण की यादों को नहीं सुखा सकी।
रहस्यों के साये में बसता शहर
लेकिन डिमोना कभी भी सिर्फ एक साधारण शहर नहीं रहा। दशकों तक यह दुनिया के सबसे ‘खुले रहस्य’—इजराइल के परमाणु परिसर—की छाया में फला-फूला। आधिकारिक तौर पर इजराइल ने हमेशा इस पर रहस्यमयी चुप्पी साधे रखी, लेकिन सामरिक गलियारों में हर कोई जानता था कि डिमोना क्या है। यह स्थल केवल इजराइल की सैन्य ताकत का प्रतीक नहीं था, बल्कि पूरे क्षेत्र के मनोवैज्ञानिक शक्ति-संतुलन की धुरी था।
यही कारण है कि 21 मार्च का यह हमला एक सामान्य घटना नहीं है।
यह हमला बताता है कि मध्य-पूर्व में अब ‘अदृश्य सीमाएं’ धुंधली पड़ रही हैं। बरसों तक कुछ ऐसे स्थल थे जिन्हें सीधे निशाने पर लेने से बचा जाता था ताकि संघर्ष एक सीमा से बाहर न निकले। डिमोना उसी श्रेणी में आता था। भले ही अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने कहा हो कि संयंत्र सुरक्षित है, लेकिन ईरानी मिसाइलों की पहुँच ने यह संदेश दे दिया है कि अब कुछ भी ‘अछूता’ नहीं है। मध्य-पूर्व में प्रतीक (Symbolism) अक्सर रणनीति (Strategy) से बड़े होते हैं, और यहाँ प्रतीक पर ही चोट की गई है।
युद्ध का नया ‘अंकगणित’ और भविष्य की चुनौती
डिमोना के पास हुए इस धमाके ने सैन्य रणनीतिकारों के सामने आधुनिक युद्ध का एक क्रूर सच पेश किया है: ‘अंकगणित का शस्त्रीकरण’ (Weaponization of Arithmetic)।
आज के दौर में एयर-डिफेंस सिस्टम इंजीनियरिंग के बेमिसाल नमूने हैं, लेकिन वे बेहद महंगे और सीमित हैं। 21 मार्च के हमले ने साबित कर दिया कि एक ‘सैचुरेशन अटैक’ (एक साथ सैकड़ों ड्रोन और मिसाइलें छोड़ना) के जरिए सबसे आधुनिक डिफेंडर को भी घुटनों पर लाया जा सकता है। हमलावर को श्रेष्ठ होने की जरूरत नहीं है, उसे बस इतना ‘किफायती’ होना है कि वह बचाव करने वाले के संसाधनों को खत्म कर सके। यह वह सबक है जिसे तेहरान से लेकर तेल अवीव और वाशिंगटन से लेकर नई दिल्ली तक पढ़ा जा रहा है।
भारत के लिए यह ‘दूर’ की बात क्यों नहीं है?
पहली नज़र में डिमोना की यह घटना एक विदेशी हेडलाइन लग सकती है, लेकिन इसके निहितार्थ भारत के लिए अत्यंत गहरे हैं:
- मानवीय संबंध: डिमोना के बेने इजराइल भारत की सभ्यतागत विरासत का हिस्सा हैं। जब युद्ध उनके आंगन तक पहुँचता है, तो इसकी टीस भारत में भी महसूस की जाती है। यह हमारी ‘सॉफ्ट पावर’ और सांस्कृतिक प्रवासियों की सुरक्षा का विषय है।
- रणनीतिक सबक: भारत खुद को ड्रोन और मिसाइल युद्ध के नए युग के लिए तैयार कर रहा है। डिमोना का हमला बताता है कि केवल महंगे विदेशी सिस्टम खरीदना काफी नहीं है; हमें लागत-प्रभावी, स्वदेशी और ‘मास वॉल्यूम’ वाले सुरक्षा तंत्र की आवश्यकता है। यह भारतीय रक्षा उद्योग (Defence Stocks) और स्टार्टअप्स के लिए एक बड़ी चेतावनी और अवसर दोनों है।
- आर्थिक धड़कन: ईरान के साथ बढ़ता कोई भी तनाव ‘हॉर्मुज जलडमरूमध्य’ को संकट में डालता है। भारत के लिए यह केवल भू-राजनीति नहीं, बल्कि उसकी अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है। तेल की कीमतों में उछाल और सप्लाई चेन में व्यवधान सीधे तौर पर भारत की विकास दर को प्रभावित करते हैं।
जब दूरी का अंत हो जाए
21 मार्च को डिमोना की रेत पर गिरी मिसाइलें केवल युद्ध की आहट नहीं थीं; वे इस बात का सबूत थीं कि अब दूरियां हमें सुरक्षित नहीं रख सकतीं।
डिमोना के उन बेने इजराइल परिवारों के लिए युद्ध अब टीवी स्क्रीन पर चलने वाली कोई खबर नहीं है। यह उनके उस शहर में दाखिल हो चुका है जहाँ उन्होंने दो संस्कृतियों को एक साथ जीना सीखा था। डिमोना आज केवल एक रणनीतिक स्थल नहीं है, बल्कि एक चेतावनी है कि आज के दौर में इतिहास की आंच से कोई भी कोना बहुत देर तक सुरक्षित नहीं रह सकता। बरसों तक डिमोना एक सुरक्षित विरोधाभास था, लेकिन अब यह एक बदलते और खतरनाक होते विश्व का नया केंद्र है।